एक राजा की दो रानियाँ
एक राजा के दो रानियाँ थीं। बड़ी रानी के कोई संतान नहीं थी, किन्तु छोटी रानी के एक पुत्र था। राजा छोटी रानी और उसके पुत्र को बहुत प्यार करते थे। यह देखकर बड़ी रानी को ईर्ष्या होती थी। बड़ी रानी राजकुमार को मार देना चाहती थी।
बड़ी रानी के षड्यंत्र
बड़ी रानी ने राजकुमार के गले में काला साँप डाल दिया। वह लड़का दशा माता की कृपा से ही पैदा हुआ था। दशा माता की कृपा से वह साँप अपने आप ही बिना लड़के को नुकसान पहुँचाए चला गया।
फिर बड़ी रानी ने राजकुमार को विष भरे लड्डू खाने को दिए। परन्तु तुरंत ही दशा माता ने दासी के भेष में वहाँ आकर लड्डू छीन लिए।
फिर बड़ी रानी ने राजकुमार को पकड़कर कुएँ में डाल दिया। परन्तु दशा माता ने राजकुमार को बीच में ही रोक लिया।
दशा माता का आगमन
जब दोपहर का समय हुआ और राजकुमार नहीं मिला तो राजा और छोटी रानी को चिंता होने लगी। वे उसे तलाश करने लगे। राजा-रानी दोनों रोने लगे।
तब दशा माता एक भिखारिणी के वेश में राजकुमार को एक वस्त्र में छिपाए हुए भिक्षा लेने के बहाने राजद्वार पर आई। तब सिपाहियों ने उसे डाँटकर बोला कि राजकुमार खो गया है और तुझे भिक्षा की पड़ी है?
तब दशा माता बोली- “भाइयों! पुण्य का प्रभाव बड़ा होता है। यदि मुझे भिक्षा मिल जाए तो सम्भव है कि खोया हुआ राजकुमार मिल जाए।” यह कहकर वह द्वार के भीतर पैर रखने लगी। उसी समय दशा माता ने एक वस्त्र में से बालक का पैर उघाड़ दिया। सिपाहियों ने सोचा कि अभी कुंवर इसके हाथ में है। इसे अंदर जाने दो। जब यह कुंवर को अंदर छोड़कर बाहर आएगी तब इसे बैठा लेंगे।
दशा माता कुंवर को लिए हुए भीतर चली गई। उसने राजकुमार को चौक में छोड़ दिया, और वहाँ से वापस होकर चल दी। परन्तु छोटी रानी ने उसे देख लिया।
दशा माता का रहस्योद्घाटन
रानी ने डाँटकर कहा कि तू कौन है तू? तीन दिन से मेरे लड़के को छुपाकर रखा। तू ने ऐसा क्यों किया? दशा माता उसी क्षण ठहर गई।
उसने कहा कि रानी मैं तुम्हारे पुत्र को चुराने वाली नहीं हूँ। मैं ही तेरी आराध्य देवी दशा माता हूँ। तुझे आगाह करने आई हूँ कि, तेरी सौत तुझसे ईर्ष्या रखती है। वही तेरे पुत्र को मारना चाहती है। अपने पुत्र को कभी उसके पास न जाने दो और सारा हाल कह सुनाया।
तब रानी माँ भगवती के पैरों में गिर पड़ी। उसने माता से प्रार्थना करी कि, जैसे आपने मेरे पुत्र की रक्षा की है, वैसे ही मेरे सुख सौभाग्य की रक्षा करना, और आप सदैव मेरे यहाँ रहना। मुझ से जो सेवा पूजा बनेंगी, सो करूँगी।
तब दशा माता बोलीं कि, मैं किसी के घर में नहीं रहती। जो श्रद्धापूर्वक मेरा स्मरण करते हैं, मैं उन्हीं के हृदय में वास करती हूँ। मैंने तुझे साक्षात् दर्शन दिया है। इसके उपलक्ष्य में तुम सुहागिनों को बुलाकर, उनको यथा विधि आदर सत्कार से भोजन कराओ। अपने नगर में ढिंढोरा पिटवा दो कि सभी लोग मेरा डोरा लिया करें, और व्रत किया करें।
यह कहकर दशा माता अंतर्ध्यान हो गई। रानी ने शहर भर के सौभाग्यशाली स्त्रियों को निमंत्रण देकर बुलाया। उनकी यथा विधि सेवा सुश्रुषा करी। गहने आदि देकर आँचल भरें और भोजन कराकर विदा किया।
शहर और राज्य में ढिंढोरा पिटवा दिया अब सब लोग दशा माता का व्रत किया करें।
