Amalki Ekadashi Vrat Katha | Amalki Ekadashi Ki Kahani

आमलकी एकादशी – पवित्र व्रत कथा | Amalka Ekadashi Story

आमलकी एकादशी

फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी का पावन व्रत एवं उसकी पौराणिक कथा

फाल्गुन मास, शुक्ल पक्ष, एकादशी

कथा का प्रारंभ

एक बार युधिष्ठिर जी ने भगवान श्रीकृष्ण से आमलकी एकादशी के बारे में वर्णन करने के लिए प्रार्थना की। भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर जी को बताया कि, राजा मान्धाता के पूछने पर महात्मा वशिष्ठ ने, आमलकी एकादशी का वर्णन किया था।

फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी को आमलकी एकादशी कहते हैं। आमलकी एक महान वृक्ष है, जो सब पापों का नाश करने वाला है।

आमलकी वृक्ष की उत्पत्ति

भगवान विष्णु के थूकने पर, उनके मुख से चन्द्रमा के समान कांतिवाला, एक बिंदु प्रकट हुआ। वह बिंदु पृथ्वी पर गिरा। उसी से आमलकी का महान वृक्ष उत्पन्न हुआ। आमलकी वृक्ष को आंवले का वृक्ष भी कहते हैं। यह सभी वृक्षों का आधीभूत वृक्ष कहलाता है।

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जब आमलकी वृक्ष उत्पन्न हुआ, इसी समय सृष्टि की रचना करने के लिए भगवान ने ब्रह्मा जी को उत्पन्न किया। देवता, दानव, गंधर्व, यक्ष, राक्षस, नाग तथा महर्षियों को ब्रह्मा जी ने जन्म दिया।

वृक्ष का दिव्य रहस्य

देवता और ऋषिगण उस स्थान पर आए जहाँ आमलकी का वृक्ष था। उसे देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। वे सोचने लगे कि विभिन्न वृक्ष तो पूर्व कल्प की ही भाँति है, जो सब के सब हमारे परिचित हैं। किंतु इस वृक्ष को हम नहीं जानते।

उन्हें इस प्रकार विस्मय में देख आकाशवाणी हुई, “महाऋषियों यह सर्वश्रेष्ठ आमलकी का वृक्ष है, जो भगवान विष्णु को प्रिय है।”

इसके स्मरण मात्र से गोदान का फल मिलता है। स्पर्श करने से दोगुना और फल भक्षण करने से तीन गुना पुण्य प्राप्त होता है। इसलिए सदा इसका सेवन करना चाहिए। यह सब पापों को हरने वाला वृक्ष बताया गया है।

वृक्ष में देवताओं का वास

इसके मूल में विष्णु, इसके ऊपर ब्रह्मा, स्कन्ध में परमेश्वर भगवान रुद्र, शाखाओं में मुनि, टहनियों में देवता, पत्तों में वसु, फूलों में मरुद्गण तथा फलों में समस्त प्रजापति वास करते हैं। इस प्रकार आमलकी वृक्ष को सर्वदेवमयी बताया गया है। इसलिए विष्णु भक्त पुरुषों को यह परम पूज्य है।

ऋषियों की स्तुति

आकाशवाणी सुनकर ऋषि बोले, “आप कौन हैं, जो इस प्रकार आमलकी वृक्ष की खूबियों का बखान कर रहे हैं?”

आकाशवाणी हुई की जो संपूर्ण भूतों के करता, और समस्त भुवनो के सृष्टा है, जिन्हें विद्वान पुरुष भी कठिनता से देख पाते हैं, वहीं सनातन विष्णु में हूँ।

संपूर्ण भूतों के आत्मभूत आत्मा एवं परमात्मा को नमस्कार है। अंतर्हित परमेश्वर को बारम्बार प्रणाम है। जिनकी महिमा कभी कम नहीं होती, उन्हें प्रणाम है। दामोदर, सर्वज्ञ और योगेश्वर को नमस्कार है। हे मायापति आपको प्रणाम है। आप विश्व के स्वामी हैं आपको नमस्कार है।

ऋषियों की स्तुति से संतुष्ट होकर, भगवान विष्णु बोले की, “तुम्हे कौनसा अभिष्ट वरदान दूँ?”

एकादशी व्रत का वरदान

ऋषि बोले, “हे भगवान, यदि आप संतुष्ट हैं, तो हम लोगों के हित के लिए, कोई ऐसा व्रत बतलाइए, जो स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करने वाला हो।”

भगवान विष्णु बोले, “ऋषियों, फागुन मास के शुक्लपक्ष में, यदि पुष्य नक्षत्र से युक्त द्वादशी हो, तो वह महान पुण्य देने वाली और बड़े बड़े पापों का नाश करने वाली होती है।”

व्रत का महत्व

आमलकी एकादशी में, आंवले के वृक्ष के पास जाकर, रात्रि में जागरण करना चाहिए। इस से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है, और 1000 गोदानों का फल प्राप्त करता है। यह व्रतों में उत्तम व्रत है, जिसे मैंने तुम लोगो को बताया है।

व्रत की विस्तृत विधि

ऋषि बोले, “हे भगवान इस व्रत की विस्तारपूर्वक विधि बताने का कष्ट करें।” भगवान विष्णु बोले, “इस व्रत की जो उत्तम विधि है उसको श्रवण करो।”

व्रत विधान

1

प्रातःकाल दंतधावन करके यह संकल्प करें कि हे पुंडरीकाक्ष, हे अच्युत, मैं एकादशी को निराहार रहकर दूसरे दिन भोजन करूँगा। आप मुझे अपनी शरण में रखें।

2

ऐसा नियम लेने के बाद मनुष्य सिर्फ सत्संगी पुरुषों से ही वार्तालाप करें। अपने मन को वश में रखें और स्नान करे।

3

स्नान से पहले शरीर में मिट्टी लगाये और यह ध्यान करें: “वसुंधरे तुम्हारे ऊपर अश्व और रथ चला करते हैं। तथा वामन अवतार के समय भगवान विष्णु ने भी तुम्हें अपने पैरों से नापा था। हे मृतिके (मिट्टी) मैंने करोड़ों जन्मो में जो पाप किए हैं, मेरे उन सब पापों को हर लो।”

4

फिर स्नान करते समय मन में यह ध्यान करें: “हे जल की अधिष्ठात्री देवी, माता, तुम संपूर्ण भूतों के लिए जीवन हो। वही जीवन, जो स्वेदज और उद्भिज्ज जाती के जीवों का भी रक्षक है। तुम रसों की स्वामिनी हो, तुम्हें नमस्कार है। आज मैं संपूर्ण तीर्थों, कुंडों, झरनों, नदियों और देव संबंधी सरोवरों में स्नान कर चुका। मेरा यह स्नान उक्त सभी स्नानों का फल देने वाला हो।”

5

इस प्रकार स्नान और ध्यान करने के बाद परशुराम जी की सोने की प्रतिमा बनवाए। प्रतिमा अपनी शक्ति और धन के अनुसार एक या आधे माशे सोने की होनी चाहिए।

पूजा विधान

फिर घर आकर पूजन और हवन करें। इसके बाद सब प्रकार की सामग्री लेकर आंवले के वृक्ष के पास जाये। वहाँ वृक्ष के चारों ओर की जमीन को साफ कर, मंत्र पाठ पूर्वक जल से भरे हुए, नवीन कलश की स्थापना करें।

कलश स्थापना

कलश में पंच रत्न और दिव्य गंध आदि रखें। श्वेत चंदन से उसको चर्चित करें। कण्ठ में फूल की माला पहनाएं। दीप जलाये और धूप आदि की सुगंध करें। पूजा के लिए नए जूते, वस्त्र और छाता भी मंगाकर रखें। कलश के ऊपर एक पात्र रख कर, उसे दिव्य खीलों से भर दें। फिर उसके ऊपर स्वर्णमय परशुराम जी की मूर्ति की स्थापना करें।

पूजा विधि

उनकी पूजा निम्न प्रकार करें: “विशोकाय नमः” कहकर उनके चरणों की, “विश्वरूपिणे नम:” कह कर दोनों घुटनों की, “उग्राय नमः” से दोनों जांघो की, “दामोदराय नमः” से कटिभाग की, “पद्मनाभाय नमः” से उदर की, “श्रीवत्स धारिणे नमः” से वक्षस्थल की, “चक्रिणे नमः” से बाईं बांह की, “गदीने नमः” से दाहिनी बांह की, “वैकुण्ठाय नमः” से कंठ की, “यज्ञमुखाय नमः” से मुख की, “विशोक निधये नमः” से नासिका की, “वासु देवाय नमः” से नेत्रों की, “वामनाय नमः” से ललाट की, “सर्वात्मने नमः” से संपूर्ण अंगो और मस्तक की पुजा करे।

फिर देवाधिदेव परशुराम जी को अर्घ्य प्रदान करें। अर्घ्य प्रदान करने का मंत्र इस प्रकार है: “देवदेवेशवर, जंदग्निनंदन, श्रीविष्णुस्वरूप, परशुरामजी, आपको नमस्कार है। आंवले के फल के साथ दिया हुआ मेरा ये अर्ध्य स्वीकार करें।”

जागरण एवं समापन

उसके बाद रात भर भजन आदि करते हुए जागरण करें। फिर भगवान विष्णु का नाम लेते हुए आमलकी वृक्ष की परिक्रमा 108 बार या 28 बार करें। फिर सवेरा होने पर भगवान विष्णु की आरती करें। ब्राह्मण की पूजा करके, वहाँ की सब सामग्री उसे प्रदान कर दे। परशुराम जी का कलश, वस्त्र, जूता आदि सभी वस्तुएं दान कर दें। और यह भावना करें कि, परशुराम जी के स्वरूप में भगवान विष्णु मुझ पर प्रसन्न हों।

फिर आमलकी वृक्ष का स्पर्श करके, उसकी परिक्रमा करें। और स्नान करने के बाद, विधिपूर्वक ब्राह्मणो को भोजन कराएं। फिर परिवारजनों के साथ बैठकर स्वयं भी भोजन करें। ऐसा करने से जो पुण्य होता है, वह सब बतलाता हूँ सुनो।

पुण्य लाभ

संपूर्ण तीर्थों के सेवन से जो पुण्य प्राप्त होता है, तथा सब प्रकार से दान देने से जो फल मिलता है, वह सब उपयुक्त विधि के पालन से सुलभ होता है।

पाप मोचन

इस व्रत से सभी पापों का नाश होता है और व्यक्ति को 1000 गोदानों के समान फल की प्राप्ति होती है।

मोक्ष प्राप्ति

समस्त यज्ञों की अपेक्षा भी अधिक फल मिलता है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। यह व्रत सब व्रतों में उत्तम है।

वशिष्ठजी कहते हैं, इतना कहकर भगवान विष्णु वहीं अंतर्ध्यान हो गए। उसके बाद उन समस्त महाऋषियों ने आमलकी व्रत का पालन किया। हे राजन, इसी प्रकार तुम्हें भी इस व्रत का अनुष्ठान करना चाहिए।

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