लगभग 400-500 वर्ष पूर्व मातृ शक्ति का केन्द्र बिजासन माता धाम की स्थापना हुई थी । यहाँ विराजी बिजासन माता अपने चमत्कारों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ एक चबुतरे के बीचों बीच नव दुर्गा के शक्ति यंत्रों को मंत्रोच्चारणों से अष्ठकोणिय भुजा के मध्य प्रतिष्ठित किया और उसकी रक्षा के लिए आठ खंभों की छोटी दिवार निर्मित की ।
इसकी स्थापना के समय से नियमित वर्षो तक वीधि विधान से यहाँ पूजा होती रही है, इस शक्ति पूंज से निरन्तर शक्ति विसर्जित होती रहती है ।
वर्ष में दो मेले
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माई साते का मेला- विक्रम संवत के माध महिने की शुक्ल पक्ष की सप्तमी जो सूर्य सप्तमी भी कही जाती है, के रोज हर साल यहाँ मेला भरता है।
फुल बंगला मेला- विक्रम संम्वत चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की पहली तारीख ( प्रतिपदा ) तिथि से ही यहाँ माता के धाम को गुलाब के शुर्क लाल फुलों के बंगलों से सजाने का क्रम चलता है, जो पूरी नवरात्रि और आगे महिने भर चलता रहता है। मध्य रात्रि तक भक्तगण भजन किर्तन करते है।
यहाँ रहने वाले सभी लोग नित्य अपने कार्य का प्रारंभ माता के चबुतरे पर आस्था से माथा नवाकर ही प्रारंभ करते है।
यहाँ किसी की मूर्ति स्थापित न होने से यह शक्ती केन्द्र किसी एक धर्म व जाती का न होकर सभी कौमों की आस्था केन्द्र बन गया है। मान्यता है कि यहां लकवा या नसों की बीमारियों से संबंधित या असाध्य रोगों से पीड़ित व्यक्ति को यहां के खोल का पानी और लच्छा बांधने से वे स्वस्थ हो जाते हैं
मंदिर में पूजा करवाने के लिए कोई पुजारी नहीं है. ऐसे में श्रद्धालु खुद ही पूजा करते हैं. बिजासन माता सेवा समिति मंदिर की देखरेख करती हैं.
यहाँ महिलाएँ माता को जल अर्पित करने के बाद कुमकुम हल्दी और लच्छा अर्पित करती है। इसके बाद घर में बने हुए लापसी और चावल का भोग माता को लगाया जाता है।
अगर कोई श्रद्धालु अपने घर में पुजा करता है तो इसका तरीका है की इस दिन चावल बनाते हैं और सात जगह ढेरी लगाकर सात बहनों के रूप में उनकी पूजा करते हैं व लच्छा चढ़ाते हैं, टिकी लगाते हैं, रुपए चढ़ाते हैं और फिर बिजासन माता के मंदिर में चबूतरे पर चढ़ा देते हैं।
जय जय बिजासन माता की । सभी की मनोकामना पूर्ण करे ।