Dasha Mata Vrat Katha 3 | Dasha Mata ki Kahani 3 | Moral Story | Pauranik Katha

Hindi

साहूकार की बेटी की कहानी

एक साहूकार का बड़ा परिवार था। पांच बेटे व पांच बहुएं थीं। एक लड़की थी। लड़की का विवाह हो चुका था, किंतु विदाई नहीं हुई थी। इस कारण लड़की माता-पिता के ही घर में थी।

दशा माता का डोरा

एक दिन साहूकार की पत्नी दशामाता के डोरे लेने लगी। उसकी बहुओं ने भी डोरे लिए। उन्होंने सास से पूछा कि क्या ननद जी का भी डोरा लिया जाए? सास ने कहा कि अवश्य। तब वे बोलीं कि उनकी व्रत के पहले ही विदाई हो गई तब क्या होगा? सास ने कहा कि मैं पूजा का सब समान साथ में दे दूंगी। वह अपने घर जाकर पूजा कर लेंगी।

लड़की ने दशा माता का डोरा ले लिया; परंतु पूजन के पहले ही उसके ससुराल से उसके पति लेने आ गए। माता ने विधिपूर्वक लड़की की विदाई की। पूजा का सब समान भी साथ रख रख दिया।

घर के सदस्यों द्वारा दशा माता के डोरे की निंदा

जब वह अपने घर पहुँची; तो पास-पड़ोस की स्त्रियाँ नई बहू को देखने आईं। सब लोग उसकी प्रशंसा करने लगीं। किसी की नज़र डोरे पर पड़ी तो वह बोलीं कि, बहू की माँ बड़ी टोटका पसंद स्त्री है। दो ताँगे सूत के उसके गले में क्यों पहना दिए हैं? सास-ननद, देवरानी-जेठानी और घर की सभी स्त्रियाँ बैठी थीं, तो उसी डोरे की सभी ने निंदा की। बहू का भी जी ऊब गया। तब उसने डोरे को तोड़ कर जलती हुई भट्टी में डाल दिया।

दशा माता का प्रकोप

डोरे में आग लगते ही उनके सारे घर में आग लग गई। सब अपने-अपने प्राण बचाकर भागे। उस जलते घर में वही स्त्री-पुरुष दोनों रह गए। दोनों जने भी गाँव छोड़कर चले गए। आगे स्त्री और पीछे-पीछे उसका पति। दोनों चलते-चलते उस गाँव में पहुँचे जहाँ की वह लड़की थी। उसने पति से कहा कि जब तक कोई जीविका का साधन नहीं मिलता, तब तक तुम भाड़ झोंककर पेट भरो। मैं भी मजदूरी करती हूँ।

पति भाड़ झोंकने लगा और पत्नी एक कुएँ पर जा बैठी। इस कुएँ पर सारे गाँव की स्त्रियाँ पानी भरने आती थीं। उस लड़की की भाभियाँ भी आईं। उन्होंने उसे वहाँ बेहाल बैठी देखा। वे बोलीं कि, बहन तुम किसी भले घर की मालूम होती हो, यहाँ कैसे बैठी हो? किसी के यहाँ काम करोगी? लड़की बोली अवश्य करूँगी। परंतु कोई नीचा काम नहीं करूँगी और खराब खाना नहीं खाऊँगी।

बड़ी भाभी बोली कि हमारे घर में तुम्हारे लिए कोई छोटा काम है ही नही। जब से हमारी ननद ससुराल चली गई है, तब से हमारे बच्चे परेशान होते हैं। तुम उन्हीं को खिला लिया करो। इस काम के लिए वह राजी हो गई। स्त्रियाँ अपने घर गईं और सास से भी अनुमति ले ली। फिर वे उसे अपने घर ले आईं। वह अपने भाभियों के बच्चों को खिलाती, और खाना बनाकर जीवन निर्वाह करती।

साहूकार की बेटी का अगले वर्ष दशा माता का डोरा लेना

कुछ महीनों बाद फिर से दशामाता के डोरे लेने का समय आया। सास ने कहा कि वह लड़की भी घर में रहती है। उसे भी डोरा लेना चाहिए। तब बहुओं ने कहा कि, नन्द जी का डोरा लिया था परंतु उनकी पूजा नहीं हो पाई। और उनकी विदाई हो गई। अब इस दुखी स्त्री का डोरा दिला देंगे। यदि पूजा होने के पहले यह भी चली गई तब क्या होगा? सास बोलीं कि इसमें क्या नुकसान है? यह जहाँ भी रहेगी पूजा कर लेगी।

तब साहूकार की बेटी ने भी दशा माता का डोरा ले लिया। नौ दिनों तक तो कथा कहानियाँ होती रहीं। व्रत पूजन यथाविधि होता रहा। दसवें दिन साहूकार की पाँचों बहुओं और उनकी सास ने सिर से स्नान किया। घर में गोबर से चौका लगाया, और पूजा की तैयारी करने लगी। तब साहूकार की बेटी बोली कि भाभी, मुझे भी फटा पुराना कोई कपड़ा मिल जाए, तो मैं भी स्नान कर आऊँ। तब बहुओं ने सास से पूछा कि, हमारे पास ननद जी की साड़ी रखी है। क्या वह साड़ी इस लड़की को दे दें? सास ने कहा कि हाँ दे दो।

अपनी पुरानी साड़ी लेकर साहूकार की बेटी स्नान करने गई। उसने सिर से स्नान करके साड़ी पहनी और गीले बाल बिखरे हुए ही घर में आ गई। अब पूजा प्रारंभ हो गई थी। ज्यों ही वह पूजा में आकर बैठी, तो एक भाभी ने कहा कि यह तो साक्षात नन्द जी लग रही है। इस पर सास नाराज हो गईं और बोलीं कि चुप रहो। मुझे कथा कहने दो। बहुएँ चुप हो गईं।

साहूकार की पत्नी का अपनी बेटी को पहचानना

फिर साहूकार की बेटी समेत घर की सारी स्त्रियों ने पारणा किया। फिर सब एक दूसरे का सिर गूंथने लगी। एक भाभी ने साहूकार की बेटी से कहा कि, आओ मैं तुम्हारा भी सिर गूंथ देती हूँ। सिर गूंथते हुए भाभी बोली कि, इस लड़की के सिर में भी वैसी ही गूंथ है, जैसी हमारी ननद के सिर में थी।

इस पर साहूकार की पत्नी बोलीं कि, मेरी लड़की तो अपने ससुराल में सुखी होगी। उसकी कहाँ इस दुखी लड़की से तुलना करती हो। सास ने बहू को डाँट तो दिया, परंतु वह बात उसके मन में भी रह गई। उसने उस लड़की से कहा कि, आज रात तुम मेरे पास मेरे कमरे में सोना। जब बाकी सारी बहुएँ सो गईं, तब साहूकार की पत्नी ने साहूकार की बेटी से पूछा कि तुम्हारा पीहर कहाँ है और वहाँ पर कौन-कौन है? उसने जवाब दिया कि उसके पीहर में भी पाँच भाई, पाँच भाभियाँ, माता और पिता थे।

साहूकार की पत्नी ने पूछा फिर क्या हुआ? वह बोली कि मैंने अपने पीहर में दशा माता का डोरा लिया था। उसका पूजन नहीं हो पाया और मेरी विदाई हो गई। ससुराल की स्त्रियों ने मेरे गले में डोरा देखकर मेरी हँसी उड़ाई। तब मैंने भी उस डोरे को आग में डाल दिया। इसी डोरे के साथ-साथ पूरा घर जलकर भस्म हो गया। सब लोग बिछड़ गए और मेरे पति और मैं भागकर वहाँ से यहाँ चले आए।

सास ने पूछा कि तेरा पति कहाँ हैं? साहूकार की बेटी बोलीं कि वह तो भाड़ झोंकने का काम करते हैं। यह कहानी सुनकर साहूकार की पत्नी अपनी बेटी को पहचान गई। वह रोने लगी। उसकी आवाज सुनकर पाँचों लड़के उसके पास आए। तब साहूकार की पत्नी ने कहा कि, यह लड़की कोई और नहीं है। तुम्हारी सगी बहन है। दशा माता के कोप से इसकी ऐसी गति हुई है।

सवेरा होते ही पाँचों भाई दामाद को भी घर ले आए। उन्होंने दामाद को स्नान कराया और अच्छे वस्त्र पहनाए। कुछ दिनों बाद उन्होंने बहिन को वापस विदा कर दिया।

साहूकार की बेटी का वापस अपने ससुराल लौटना

जब साहूकार की बेटी वापस ससुराल जा रही थी, तब रास्ते में एक नदी मिली। वहाँ पर कुछ अप्सराएँ नहाकर दशामाता का डोरा ले रही थीं। उनके पास एक डोरा अधिक था। उनमें से एक ने साहूकार की बेटी की डोली के पास जाकर पूछा। और साहूकार की बेटी को भी डोरा दे दिया। जब साहूकार की बेटी घर पहुँची तब उसकी सास, देवरानी, जेठानी सब उसका इंतज़ार कर रहे थे।

साहूकार की बेटी ने कहा कि, आप लोगों ने पहले दशामाता के डोरे की निंदा की थी। इसलिए हम सब बिछड़ गए, और घर का सारा धन-धान्य ख़त्म हो गया। अबकी बार कोई डोरे की चर्चा न करना। सबने खुशी-खुशी उसकी बात मान ली। नौ दिन कथा कहानियाँ हुईं। दसवें दिन विधिपूर्वक डोरे की पूजा हुई। सात सुहागिन स्त्रियों को न्योता दिया गया। मेहँदी आदि से उनका श्रृंगार किया गया। उनके आँचल भरे गए। इस प्रकार खुशी-खुशी दशा माता का पूजन सम्पन्न हुआ।

हे दशामाता, जैसे आप ने साहूकार की बेटी के अच्छे दिन वापस ला दिए, वैसे ही सभी पर कृपा करना।

सीखें

  • नकारात्मकता और ईर्ष्या से दूर रहें।
  • सभी धार्मिक रीति-रिवाजों का सम्मान करें।
  • दूसरों की भावनाओं का सम्मान करें।

दशा माता की पहली कहानी

दशा माता की दूसरी कहानी

दशा माता की तीसरी कहानी

दशा माता की चौथी कहानी

दशा माता की पाँचवी कहानी

दशा माता की छठी कहानी

दशा माता की सातवीं कहानी

दशा माता की आठवीं कहानी

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