साहूकार की बेटी की कहानी
एक साहूकार का बड़ा परिवार था। पांच बेटे व पांच बहुएं थीं। एक लड़की थी। लड़की का विवाह हो चुका था, किंतु विदाई नहीं हुई थी। इस कारण लड़की माता-पिता के ही घर में थी।
दशा माता का डोरा
एक दिन साहूकार की पत्नी दशामाता के डोरे लेने लगी। उसकी बहुओं ने भी डोरे लिए। उन्होंने सास से पूछा कि क्या ननद जी का भी डोरा लिया जाए? सास ने कहा कि अवश्य। तब वे बोलीं कि उनकी व्रत के पहले ही विदाई हो गई तब क्या होगा? सास ने कहा कि मैं पूजा का सब समान साथ में दे दूंगी। वह अपने घर जाकर पूजा कर लेंगी।
लड़की ने दशा माता का डोरा ले लिया; परंतु पूजन के पहले ही उसके ससुराल से उसके पति लेने आ गए। माता ने विधिपूर्वक लड़की की विदाई की। पूजा का सब समान भी साथ रख रख दिया।
घर के सदस्यों द्वारा दशा माता के डोरे की निंदा
जब वह अपने घर पहुँची; तो पास-पड़ोस की स्त्रियाँ नई बहू को देखने आईं। सब लोग उसकी प्रशंसा करने लगीं। किसी की नज़र डोरे पर पड़ी तो वह बोलीं कि, बहू की माँ बड़ी टोटका पसंद स्त्री है। दो ताँगे सूत के उसके गले में क्यों पहना दिए हैं? सास-ननद, देवरानी-जेठानी और घर की सभी स्त्रियाँ बैठी थीं, तो उसी डोरे की सभी ने निंदा की। बहू का भी जी ऊब गया। तब उसने डोरे को तोड़ कर जलती हुई भट्टी में डाल दिया।
दशा माता का प्रकोप
डोरे में आग लगते ही उनके सारे घर में आग लग गई। सब अपने-अपने प्राण बचाकर भागे। उस जलते घर में वही स्त्री-पुरुष दोनों रह गए। दोनों जने भी गाँव छोड़कर चले गए। आगे स्त्री और पीछे-पीछे उसका पति। दोनों चलते-चलते उस गाँव में पहुँचे जहाँ की वह लड़की थी। उसने पति से कहा कि जब तक कोई जीविका का साधन नहीं मिलता, तब तक तुम भाड़ झोंककर पेट भरो। मैं भी मजदूरी करती हूँ।
पति भाड़ झोंकने लगा और पत्नी एक कुएँ पर जा बैठी। इस कुएँ पर सारे गाँव की स्त्रियाँ पानी भरने आती थीं। उस लड़की की भाभियाँ भी आईं। उन्होंने उसे वहाँ बेहाल बैठी देखा। वे बोलीं कि, बहन तुम किसी भले घर की मालूम होती हो, यहाँ कैसे बैठी हो? किसी के यहाँ काम करोगी? लड़की बोली अवश्य करूँगी। परंतु कोई नीचा काम नहीं करूँगी और खराब खाना नहीं खाऊँगी।
बड़ी भाभी बोली कि हमारे घर में तुम्हारे लिए कोई छोटा काम है ही नही। जब से हमारी ननद ससुराल चली गई है, तब से हमारे बच्चे परेशान होते हैं। तुम उन्हीं को खिला लिया करो। इस काम के लिए वह राजी हो गई। स्त्रियाँ अपने घर गईं और सास से भी अनुमति ले ली। फिर वे उसे अपने घर ले आईं। वह अपने भाभियों के बच्चों को खिलाती, और खाना बनाकर जीवन निर्वाह करती।
साहूकार की बेटी का अगले वर्ष दशा माता का डोरा लेना
कुछ महीनों बाद फिर से दशामाता के डोरे लेने का समय आया। सास ने कहा कि वह लड़की भी घर में रहती है। उसे भी डोरा लेना चाहिए। तब बहुओं ने कहा कि, नन्द जी का डोरा लिया था परंतु उनकी पूजा नहीं हो पाई। और उनकी विदाई हो गई। अब इस दुखी स्त्री का डोरा दिला देंगे। यदि पूजा होने के पहले यह भी चली गई तब क्या होगा? सास बोलीं कि इसमें क्या नुकसान है? यह जहाँ भी रहेगी पूजा कर लेगी।
तब साहूकार की बेटी ने भी दशा माता का डोरा ले लिया। नौ दिनों तक तो कथा कहानियाँ होती रहीं। व्रत पूजन यथाविधि होता रहा। दसवें दिन साहूकार की पाँचों बहुओं और उनकी सास ने सिर से स्नान किया। घर में गोबर से चौका लगाया, और पूजा की तैयारी करने लगी। तब साहूकार की बेटी बोली कि भाभी, मुझे भी फटा पुराना कोई कपड़ा मिल जाए, तो मैं भी स्नान कर आऊँ। तब बहुओं ने सास से पूछा कि, हमारे पास ननद जी की साड़ी रखी है। क्या वह साड़ी इस लड़की को दे दें? सास ने कहा कि हाँ दे दो।
अपनी पुरानी साड़ी लेकर साहूकार की बेटी स्नान करने गई। उसने सिर से स्नान करके साड़ी पहनी और गीले बाल बिखरे हुए ही घर में आ गई। अब पूजा प्रारंभ हो गई थी। ज्यों ही वह पूजा में आकर बैठी, तो एक भाभी ने कहा कि यह तो साक्षात नन्द जी लग रही है। इस पर सास नाराज हो गईं और बोलीं कि चुप रहो। मुझे कथा कहने दो। बहुएँ चुप हो गईं।
साहूकार की पत्नी का अपनी बेटी को पहचानना
फिर साहूकार की बेटी समेत घर की सारी स्त्रियों ने पारणा किया। फिर सब एक दूसरे का सिर गूंथने लगी। एक भाभी ने साहूकार की बेटी से कहा कि, आओ मैं तुम्हारा भी सिर गूंथ देती हूँ। सिर गूंथते हुए भाभी बोली कि, इस लड़की के सिर में भी वैसी ही गूंथ है, जैसी हमारी ननद के सिर में थी।
इस पर साहूकार की पत्नी बोलीं कि, मेरी लड़की तो अपने ससुराल में सुखी होगी। उसकी कहाँ इस दुखी लड़की से तुलना करती हो। सास ने बहू को डाँट तो दिया, परंतु वह बात उसके मन में भी रह गई। उसने उस लड़की से कहा कि, आज रात तुम मेरे पास मेरे कमरे में सोना। जब बाकी सारी बहुएँ सो गईं, तब साहूकार की पत्नी ने साहूकार की बेटी से पूछा कि तुम्हारा पीहर कहाँ है और वहाँ पर कौन-कौन है? उसने जवाब दिया कि उसके पीहर में भी पाँच भाई, पाँच भाभियाँ, माता और पिता थे।
साहूकार की पत्नी ने पूछा फिर क्या हुआ? वह बोली कि मैंने अपने पीहर में दशा माता का डोरा लिया था। उसका पूजन नहीं हो पाया और मेरी विदाई हो गई। ससुराल की स्त्रियों ने मेरे गले में डोरा देखकर मेरी हँसी उड़ाई। तब मैंने भी उस डोरे को आग में डाल दिया। इसी डोरे के साथ-साथ पूरा घर जलकर भस्म हो गया। सब लोग बिछड़ गए और मेरे पति और मैं भागकर वहाँ से यहाँ चले आए।
सास ने पूछा कि तेरा पति कहाँ हैं? साहूकार की बेटी बोलीं कि वह तो भाड़ झोंकने का काम करते हैं। यह कहानी सुनकर साहूकार की पत्नी अपनी बेटी को पहचान गई। वह रोने लगी। उसकी आवाज सुनकर पाँचों लड़के उसके पास आए। तब साहूकार की पत्नी ने कहा कि, यह लड़की कोई और नहीं है। तुम्हारी सगी बहन है। दशा माता के कोप से इसकी ऐसी गति हुई है।
सवेरा होते ही पाँचों भाई दामाद को भी घर ले आए। उन्होंने दामाद को स्नान कराया और अच्छे वस्त्र पहनाए। कुछ दिनों बाद उन्होंने बहिन को वापस विदा कर दिया।
साहूकार की बेटी का वापस अपने ससुराल लौटना
जब साहूकार की बेटी वापस ससुराल जा रही थी, तब रास्ते में एक नदी मिली। वहाँ पर कुछ अप्सराएँ नहाकर दशामाता का डोरा ले रही थीं। उनके पास एक डोरा अधिक था। उनमें से एक ने साहूकार की बेटी की डोली के पास जाकर पूछा। और साहूकार की बेटी को भी डोरा दे दिया। जब साहूकार की बेटी घर पहुँची तब उसकी सास, देवरानी, जेठानी सब उसका इंतज़ार कर रहे थे।
साहूकार की बेटी ने कहा कि, आप लोगों ने पहले दशामाता के डोरे की निंदा की थी। इसलिए हम सब बिछड़ गए, और घर का सारा धन-धान्य ख़त्म हो गया। अबकी बार कोई डोरे की चर्चा न करना। सबने खुशी-खुशी उसकी बात मान ली। नौ दिन कथा कहानियाँ हुईं। दसवें दिन विधिपूर्वक डोरे की पूजा हुई। सात सुहागिन स्त्रियों को न्योता दिया गया। मेहँदी आदि से उनका श्रृंगार किया गया। उनके आँचल भरे गए। इस प्रकार खुशी-खुशी दशा माता का पूजन सम्पन्न हुआ।
हे दशामाता, जैसे आप ने साहूकार की बेटी के अच्छे दिन वापस ला दिए, वैसे ही सभी पर कृपा करना।
सीखें
- नकारात्मकता और ईर्ष्या से दूर रहें।
- सभी धार्मिक रीति-रिवाजों का सम्मान करें।
- दूसरों की भावनाओं का सम्मान करें।
The Story of the Sahukaar’s Daughter
A wealthy Sahukaar (banker of olden times) had a large family. He had five sons and five daughters-in-law. He also had a daughter. His daughter was married, but had not yet been sent to her husband’s home. Therefore, she was still living with her parents.
The Dasha Mata’s Thread
One day, the sahukaar’s wife started observing the Dasha Mata’s ritual, tying a sacred thread. Her daughters-in-law also tied the thread. They asked their mother-in-law if they should also take the thread for their sister-in-law.
The mother-in-law said yes. Then they said, “What if she is sent to her husband’s home before completing the ten days ritual?” The mother-in-law replied, “I will give her all the necessary items for completing the puja. She can complete the puja at her husband home.”
The sahukaar’s daughter and took the Dasha Mata’s thread; however, before the worship, her husband came to take her. The mother performed the farewell ceremony properly and kept all the necessary items for daughter to complete Dasha Mata pooja at her husband’s home.
Criticism of Dasha Mata by Family members
When she reached her new home, the women from the neighborhood came to see the new bride. Everyone praised her. Someone noticed the thread and said, “The bride’s mother is very superstitious. Why did she put two strands of thread around her neck?”
The mother-in-law, sisters-in-law, and all the women in the house also criticized the thread. The new bride also got fed up. So, she broke the thread and threw it into a burning furnace.
The wrath of Dasha Mata
As soon as the thread caught fire, their entire house caught fire. Everyone ran to save their lives. Only the husband and wife remained in the burning house.
Both of them also left the village. The sahukaar daughter went ahead, and her husband followed her. They reached the village where the sahukaar daughter belonged. She told her husband that until they find a way to earn their livelihood, the husband should work as a furnace worker to support them. She would also find some work.
The husband started working at a furnace, and the wife sat by a well. All the women of the village came to that well to fetch water. The woman’s sisters-in-law also came. They saw her sitting there dejected. They asked, “Sister, you seem to be from a good family. Why are you sitting here? Are you looking for some work?” The girl said, “Yes, I am looking for some work. But I won’t do any menial work or eat bad food.”
The elder sister-in-law said, “We don’t have any menial work in our house. Since our sister-in-law had left, our children have been struggling. You can take care of them.” She agreed to do this work. The women went to their home and took permission from their mother-in-law. Then they brought her home. She took care of her sisters-in-law’s children and earned her livelihood by cooking.
Sahukaar Daughter took Dasha Mata Dora next year
After few months it was again time to follow the rituals of Dasha Mata. The mother-in-law said that the girl working in their home should also tie the Dasha Mata thread. Then the daughters-in-law said, “We tied the thread for our sister-in-law, but her worship could not be completed. And she was sent to her in-laws’ home. Now if we will have this unfortunate woman tie the thread. What if she also leaves before the worship is completed?” The mother-in-law said, “What is the harm ? She can perform the worship wherever she goes.”
So, the sahukaar’s daughter also tied the Dasha Mata’s thread. For nine days, stories were told and the worship was performed regularly. On the tenth day, the sahukaar’s five daughters-in-law and their mother-in-law took a bath from head to toe. They cleaned the house and started preparing for the worship.
The sahukaar’s daughter said, “Sister-in-law, if you could give me some old clothes, I will also take a bath.” Then the daughters-in-law asked their mother-in-law, “We are having our sister-in-law’s saree. Can we give that saree to this girl?” The mother-in-law agreed to this.
The sahukaar’s daughter took her old saree and went to take a bath. She took a bath from head to toe, wore the saree, and came in front of everyone, with her wet loose hair. Now the worship had begun. As soon as she sat in the worship, one of the daughter-in-law said, “She looks exactly like our husband’s sister.” The mother-in-law got angry and said, “Be quiet. Let me recite the Dasha Mata story.” The daughters-in-law became silent.
Sahukaar’s Wife recognized her Daughter
Then the sahukaar’s daughter, along with all the women in the house, completed the ritual. Then everyone started braiding each other’s hair. A daughter-in-law said to the sahukaar’s daughter, “Come, I’ll braid your hair too.” While braiding her hair, the daughter-in-law said, “This girl’s hair is the same as our sister-in-law’s.”
The sahukaar’s wife said, “My daughter would have been happy in her in-laws’ home. Why do you compare her with this unfortunate girl?” The mother-in-law scolded her daughter-in-law, but the words stayed in her mind. She told the girl, “Sleep in my room with me tonight.”
When all the other daughters-in-law were asleep, the sahukaar’s wife asked her daughter, “Where is your father’s home, and who all is there?” She replied that she also has five brothers, five sisters-in-law, her mother, and her father. The sahukaar’s wife asked what happened and why are you in such a situation?
She said that she had tied the Dasha Mata’s thread in her father’s home. Her worship was not completed, and she was sent to her husband’s home. The women in her in-laws’ house, made fun of her seeing the thread on her neck. So she threw the thread into the fire. With the thread, the whole house burned down. Everyone got separated, and her husband and she ran away from there.
The mother-in-law asked where her husband was. The sahukaar’s daughter said that he was working as a furnace worker. After hearing this story, the sahukaar’s wife recognized her daughter. She started crying. Hearing her voice, all five sons came to her. Then the sahukaar’s wife said, “This girl is none other than your sister. Because of Dasha Mata’s anger, she is in this situation.”
In the morning, the five brothers went to the furnace where their sister’s husband was working. They made him bathe and wear nice clothes. For a few days both the sister and her husband lived happily at the sister’s house. After few days the sister and her husband went back to the husband’s home.
The sahukaar’s daughter was going back to her in-laws’ house. There was a river on the way. Some nymphs were bathing there and were tying the Dasha Mata’s thread. They had one extra thread. One of them went near the sahukaar’s daughter’s palanquin and gave the thread to her. When the sahukaar’s daughter reached home, her mother-in-law, sisters-in-law, and everyone was waiting for her.
The sahukaar’s daughter said, “You all had criticized the Dasha Mata’s thread earlier. Therefore, we all got separated, and all the wealth of the house was lost. This time, don’t talk about the thread.”
Everyone happily agreed to her words. For nine days, dasha mata stories were told. On the tenth day, the worship of the thread was performed properly. Seven married women were invited. They were adorned with henna, etc. They were given gifts as per occasion. Thus, the worship of Dasha Mata was completed happily.
O Dasha Mata, just as you brought back the good days of the sahukaar’s daughter, please shower your grace on everyone.
Lessons
- Stay away from negativity and jealousy.
- Respect all religious customs and traditions.
- Respect other’s feelings.