Dasha Mata Vrat Katha 6 | Dasha Mata ki Kahani 6 | Dasha Mata ki chhati Kahani

Hindi

देवरानी-जेठानी और दशा माता

एक घर में देवरानी-जेठानी थीं। उनके कोई संतान नहीं थी। वे मेहनत-मजदूरी करके अपना पेट पालती थीं। एक सवेरे वे गाँव में आग लेने गईं, परंतु किसी ने उन्हें आग नहीं दी क्योंकि उस दिन गाँव भर में दशा माता का पूजन था। उन्होंने सोचा कि अब क्या किया जाए? कोई आग देता ही नहीं। आखिर जेठानी बोली कि कोई बात नहीं। आज हम लोगों का भी व्रत ही सही।

दशा माता का व्रत

शाम को जब आग मिलेगी तब आग जलाकर भोजन पका लेंगे। संध्या समय जब जेठानी एक पड़ोसी के यहाँ आग लेने गई तो उसने पूछा कि, दशा माता का पूजन करने से क्या होता है? पड़ोसन ने जवाब दिया कि, जिस बात की इच्छा करके गंडे लिए जाते हैं, वह इच्छा पूर्ण होती है। तब जेठानी बोली कि बहन! अब की बार जब गंडे पड़ें तो मैं भी गंडा लूंगी। जेठानी आग लेकर पड़ोसन के घर से बाहर निकली तो उसे गायें दिखाई दीं। ग्वाला पीछे-पीछे आ रहा था। उसके कंधे पर एक बछड़ा था। और एक गाय उसे चाटती हुई उसके पीछे-पीछे आ रही थी। पड़ोसन ने पूछा- भैया! तुम्हारी गाय पहली बार ब्याई है या दूसरी-तीसरी बार? उसने कहा कि पहली बार। फिर उसने ग्वाले से पूछा कि बछड़ा है या बछड़ी है? ग्वाले ने कहा कि बछड़ा है।

तब पड़ोसन ने जेठानी से कहा कि, लो अब घर जाकर दशा माता का गंडा ले लो। नौ दिन तक कथा-कहानियाँ सुनना। दसवें दिन सिर से स्नान करके पूजन करना। दशा माता दस दिन के भीतर ही तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करेगी। अपने घर जाकर जेठानी ने अपनी देवरानी को भी यह बात बताई। दोनों ने दशा माता के गंडे लिए और माता से प्रार्थना की, कि हमारे संतान पैदा हों, तो हम विधि-विधान से व्रत सम्पूर्ण करेंगी।

संतान और मनौती

दशा माता की कृपा से देवरानी-जेठानी दोनों ही गर्भवती हो गईं। नौ महीने नौ दिन के बाद दोनों के गर्भ से दो सुंदर बालक जन्मे। देवरानी ने कहा कि लड़के होने पर जो सुहागिनें न्यौतने की मनौती थी, उसको पूरा करना चाहिए। जेठानी ने कहा कि अभी ऐसी जल्दी क्या है। जब लड़के बड़े होंगे, उनकी सगाई होगी, उसी दिन सुहागिनें न्यौत देंगे।

लड़के बड़े हो गए। उनका सगाई-संबंध भी पक्का हो गया। फिर भी जेठानी ने सुहागिनें नहीं न्योतीं। उसने कहा कि जिस दिन लड़कों की भँवरे पड़ेंगी, उसी दिन सुहागिनें न्यौत देंगे। तब देवरानी बोली कि बहन! तुम जब चाहो तब करना, पर मैं तो मंडप के दिन ही सुहागिनें न्यौतुंगी। देवरानी ने जैसा कहा था, वैसा ही किया। उसने मंडप के दिन ही सुहागिनें न्योतीं, परंतु जेठानी ने कुछ भी परवाह नहीं की, बारात सजा-कर दोनों दूल्हे ब्याहने के लिए चले गए ।

दशा माता द्वारा जेठानी के बेटे का हरण

जिस लड़के की माता ने मंडप के दिन सुहागिनें न्योती थीं, उसका विवाह बड़ी धूमधाम से पूर्ण हो गया, परंतु जिसकी माता ने सुहागिनें नहीं न्योती थीं, उसको ठीक भवरों के समय दशा माता मंडप से हरकर ले गई। उस लड़के का नाम विवेक था। दूल्हे को एकदम गायब देखकर दोनों पक्षों में हाहाकार मच गया।

जिस लड़की से विवेक की शादी होने वाली थी उसका नाम सुधा था। लड़की की माता संकट में पड़ गई कि, अब उसकी लड़की का क्या होगा? पास-पड़ोस की चतुर स्त्रियों ने लड़की की माता को समझाया और ब्याह का जो सीधा-समान बचा हुआ था, उसे उसी लड़की सुधा के हवाले कर दिया। लड़की भिखारियों को सदाव्रत देने लगी।

साधू और इन्द्र सभा

एक दिन एक साधु तीर्थ यात्रा करता हुआ उसी गाँव की ओर आया। गाँव से बहुत दूर एक जंगल में एक बड़ा पीपल का पेड़ था। लोग उस पेड़ को पारस पीपल कहते थे। उसी पेड़ में दशा माता रहती थी। साधु शाम को उसी पेड़ के नीचे ठहर गया। वहाँ अंधेरा हो गया था। जब शाम का समय हुआ तो झाड़ू लगाने वाले ने उस पेड़ के पास मैदान में झाड़ू लगाई। फिर भिश्ती ने आकर जमीन पर पानी छिड़का। और माली ने आकर फूल बिखेर दिए। तब अनेक देवता, अनेक प्रकार की पोशाक पहने हुए, आ-आकर अपने-अपने स्थान पर बैठने लगे। सबसे पीछे राजा इंद्र का सिंहासन उतरा। उसी समय कई अप्सराएँ भी आसमान से उतरीं, और इंद्र के सिंहासन के सामने नाचने लगीं।

उसी समय दशा माता विवेक को गोद में लिए पीपल के पेड़ से उतरी। इंद्रदेव के साथ-साथ स्वर्ग से एक गाय भी आई थी। उस गाय ने दो कटोरी दूध दिया। विवेक ने एक कटोरा दूध पी लिया और एक कटोरा दूध अपनी पत्नी सुधा के लिए रख दिया। जब तक अप्सराओं का नाच होता रहा तब तक दशा माता विवेक को गोद में लिए बैठी रहीं। सवेरा होते-होते देवता वापस चले गए। साधु भी वहाँ से चलकर गाँव में आ गया।

साधू का सुधा से मिलना

वहीं साधु गाँव में भिक्षा माँगता-माँगता सुधा के घर आया। सुधा ने उसके लिए भोजन तैयार किया। साधु जब भोजन करने बैठा तब सुधा ने तीन पत्तलें परोसीं। एक को विवेक के नाम से अलग सरका दिया, एक साधु को दी और एक अपने सामने रखी। तीन पत्तलें देखकर साधु ने अपने आप से कहा। जो बात वहाँ देखने आई थी, वही बात यहाँ भी देखने में आ रही है। लड़की ने पूछा कि साधु बाबा आप क्या बात बोल रहे हैं? साधु ने बोला कि हम वैरागी लोग ऐसे ही अनेक बातें कहा करते हैं। तुम्हारा इन बातों से कोई मतलब नहीं है। तुम अपना भोजन करो।

सुधा हठ करने लगी फिर भी साधु बाबा चुप रहे। तब सुधा ने कहा कि आप साधु हैं तो मैं भी सती हूँ। आप या तो मुझे बात बताओ, या फिर मेरा श्राप लीजिये। तब साधु ने रात का सारा हाल, जो पीपल के पेड़ के नीचे हुआ था, उसे बता दिया।

सुधा का विवेक से मिलना

सुधा ने साधु बाबा के साथ पीपल के पेड़ के पास जाने का निश्चय किया। साधु बाबा आगे चले, सुधा उसके पीछे चली। साधु बाबा सुधा को पारस पीपल के पेड़ के पास छोड़कर चले गए। जब शाम हुई तो रोज़ की तरह झाड़ू वाला झाड़ू लगाने आया, भिश्ती ने पानी छिड़का और माली ने फूल बिखेरे। फिर देवता और राजा इंद्र आए और अप्सराओं का नाच-गाना होने लगा। उसी समय दशा माता पीपल के पेड़ पर से उतरकर इंद्र दरबार में बैठ गई। विवेक ने गाय से दूध लिया और उसने सुधा के लिए एक कटोरी दूध अलग रख दिया। जैसे ही विवेक ने अपना कटोरा मुँह से लगाया, वैसे ही सुधा अपना कटोरा हाथ में लेकर विवेक के सामने आ गई।

सुधा बोली कि मैं अपना भाग लेने के लिए आ गई हूँ, सेवा भी करूँगी। विवेक बोला कि मैं दशा माता की सेवा में रहता हूँ। अभी मुझे दरबार में जाकर उन्हीं की गोद में बैठना होगा। यदि तुम मुझ को चाहती हो, तो दशा माता को प्रसन्न करके, उनसे मुझको मांग लो। फिर विवेक जाकर दशा माता की गोद में बैठ गया। सुधा अप्सराओं के साथ नाचने लगी।

दशा माता द्वारा सुधा तो वरदान

जब सवेरा हुआ तब दशा माता ने कहा कि यह नई नाचने वाली लड़की बहुत अच्छा नाची है। दशा माता ने सुधा से कहा कि मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। अपनी इच्छा का वर मांगो। सुधा ने दशा माता से वचन ले लिया कि जो मांगूंगी सो आपको देना पड़ेगा। फिर उसने तुरंत दौड़कर विवेक को पकड़ लिया और कहा कि मुझे यही चाहिए। दशा माता ने कहा कि तूने बहुत बड़ी चीज़ मांगी है। परंतु मैं वचन दे चुकी हूँ। इस कारण तेरा पति तुझे दे देती हूँ। राजा इंद्र ने दशा माता से पूछा कि, हे भगवती यह सब क्या भेद है ? ज़रा मुझे भी बताइए? तब दशा माता ने बताया कि यह लड़का विवेक मेरे ही वरदान से पैदा हुआ था। इसकी माता ने मनौती मांगी थी कि, जब लड़का पैदा होगा ,तब सुहागिनों का न्योता दूंगी। परंतु उसने आज तक अपना वचन पूरा नहीं किया। इसी कारण मैं अपने दिए हुए बालक को विवाह मंडप से ले कर आ गई।

यह लड़की वही स्त्री है जिसकी इस लड़के से शादी होने वाली थी। परंतु यह पतिव्रता है। इस कारण यह देव समाज में पहुँचकर मुझसे अपना पति छीनकर ले जा रही है।

देवताओं द्वारा पतिव्रता सुधा का स्वागत

दशा माता के ऐसे वचन सुनकर इंद्र एवं सभी देवताओं ने विवेक और सुधा के ऊपर फूल बरसाए। तब तक साधु बाबा भी वहाँ पर आ गए।

फिर साधु बाबा, विवेक, और सुधा तीनों गाँवों की ओर चले।

सुधा और विवेक का वापस अपने गाँव को लौटना

जब वे गाँव के नज़दीक पहुँचे तब लोगों ने सुधा के पिता को उनके आने के संबंध में खबर दी। जिस दिन से सुधा चली गई थी ,उस दिन से सुधा के पिताजी ने लज्जा के मारे घर से बाहर निकलना बंद कर दिया था। उन्होंने सोचा कि कहीं लोग मेरा उपहास तो नहीं कर रहे हैं। परंतु जब गाँव के प्रतिष्ठित लोगों ने भी उनसे यही बात कही, तब वे अपने घर से बाहर निकलकर आए।

जब उन्होंने सुधा को विवेक के साथ घर के दरवाजे पर खड़ा देखा तब उनकी प्रसन्नता का पार न रहा। सुधा ने अपनी माँ से कहा कि पहले विवेक के घर से सुहागिनों को न्यौत कर बारात यहाँ आनी चाहिए। सुधा के पिता ने विवेक के घर खबर भेजी। वहाँ सुहागिनों को न्योत कर बारात चली। बड़ी धूमधाम से विवाह हुआ। विवेक और सुधा दोनों अपने घर गए, तब फिर से विवेक की माता ने सुहागिनें न्योतीं।

हे दशा माता, जैसे आपने सुधा की दशा फेरी, वैसे ही इस कथा को सुनने और सुनाने वाले सभी का कल्याण करें।

कहानी से सीख

  • अपने वचन का पालन करना चाहिए।
  • ईमानदारी और पतिव्रता धर्म का बड़ा महत्व है ।
  • भगवान में आस्था और प्रार्थना का अद्भुत फल होता है ।

दशा माता की पहली कहानी

दशा माता की दूसरी कहानी

दशा माता की तीसरी कहानी

दशा माता की चौथी कहानी

दशा माता की पाँचवी कहानी

दशा माता की छठी कहानी

दशा माता की सातवीं कहानी

दशा माता की आठवीं कहानी

दशा माता की नवी कहानी

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