एक ब्राह्मणी की कहानी
एक गांव में एक ब्राह्मणी रहती थी। उसके एक लड़का था। उसका नाम विनोद था। एक दिन ब्राह्मणी अपने बेटे से बोली, “बेटा, कुछ काम करो। जिससे अपना जीवन निर्वाह हो।” तब विनोद ने गांव वालों की गाय चराने का काम शुरू किया।
विनोद को दशामाता का गंडा प्राप्त होना
एक दिन विनोद गायों को पानी पिलाने घाट पर ले गया। वहाँ कुछ स्त्रियाँ स्नान करके दशामाता के गंडे ले रही थीं। उनके पास एक गंडा अधिक था। उन स्त्रियों ने विनोद से पूछा कि तुम कौन से वर्ण के हो? विनोद ने कहा कि वह ब्राह्मण है, पर कोई काम न मिलने के कारण गायें चराता है।
उन स्त्रियों ने विनोद को एक गंडा देकर कहा कि, “तुम इसे घर ले जाकर अपनी माता को देना, और उनसे कहना कि इस गंडे का पूजन और व्रत करें। हम लोग तुम्हें पूजा सामग्री भी देते हैं। वह भी ले जाकर अपनी माता को देना।”
लड़के ने गंडा ले लिया। लड़का पूजा सामग्री को अपनी गठरी में बांधकर घर ले गया। लड़के ने सब बात ब्राह्मणी को बताकर सारा सामान उसे दे दिया। ब्राह्मणी ने प्रेमपूर्वक गंडे को माथे से लगाया। उसी दिन से वह व्रत करने लगी। नौ दिन कथा कहानी कहती रही।
दशामाता की कृपा
दसवें दिन उसने गंडे के पूजन की तैयारी की। वह घर के बाहर लिपाई कर रही थी। तभी वहाँ एक वृद्ध गरीब स्त्री आई। गरीब स्त्री ने आकर पूछा कि, “बहन, तुम क्या कर रही हो?” ब्राह्मणी ने जवाब दिया कि आज मेरे घर में दशा माता का पूजन है। गरीब स्त्री ने ब्राह्मणी से पानी पिलाने को कहा। ब्राह्मणी बोली कि, “तुम ज़रा ठहरो, मैं कटोरी ढूँढ़ लाऊँ। फिर तुमको पानी पिलाऊँगी।” जब ब्राह्मणी कटोरी लेने अंदर गई, तब उस गरीब स्त्री ने ब्राह्मणी के घर के बाहर एक सोने का घड़ा रखा। फिर वह अंतर्ध्यान हो गई। वह गरीब स्त्री कोई और नहीं, बल्कि दशामाता ही थी।
ब्राह्मणी कटोरी लेकर जैसे ही बाहर आई तो वहाँ सोने का घड़ा देखकर घबरा गई। उसने सोचा कि सोने का घड़ा कहाँ से आ गया? कहीं मुझ पर चोरी का इल्ज़ाम न लग जाए। इसी चिंता में ब्राह्मणी उस गरीब स्त्री की खोज में बाहर निकली। तब तक उसका लड़का भी आ गया। ब्राह्मणी ने सारी बात अपने बेटे को बताई। बेटा बोला कि वह तो दशामाता थीं। उन्होंने सोने का घड़ा तुमको दे दिया है। अगर अबकी बार वे फिर आए, तो उनका अच्छी तरह स्वागत करना।
फिर ब्राह्मणी नदी में नहाने चली गई। जब वह नदी में नहाकर आई तो किनारे पर उसे सोने का भरा हुआ घड़ा दिखाई दिया और उत्तम वस्त्र भी पास ही रखे थे। उसने उन वस्त्रों को पहन लिया और घड़ा हाथ में लेकर घर की ओर जाने लगी। तभी चार कहार डोली लिए आ पहुँचे, और ब्राह्मणी से बोले कि यह डोली तुम्हारे लिए आई है। इसमें बैठकर घर चलो। जब वह घर पहुँचीं तो देखती है कि, उसकी टूटी-फूटी झोपड़ी की जगह एक बड़ा महल खड़ा था।
ब्राह्मणी ने महल के भीतर श्रद्धा और भक्तिपूर्वक दशामाता के गंडे की पूजा की। फिर हाथ जोड़कर उसने दशा माता से वरदान माँगा, “मेरे लड़के का विवाह हो जाए।” कुछ दिनों बाद लड़के का विवाह हो गया। बहुत ही सुशील बहू घर में आई। तब ब्राह्मणी ने दशा माता से दूसरा वर माँगा। उसने माता से वर माँगा कि, उसके एक पोता हो जाए। कुछ दिनों बाद बुढ़िया के लड़के को एक बेटा भी हो गया।
ब्राह्मणी की मृत्यु और बहू की परीक्षा
एक दिन ब्राह्मणी ने बहू को समझाया कि, मेरी यह सब संपत्ति दशामाता की दी हुई है। उन्हीं की कृपा से तुम भी इस घर में आई हो। यदि मैं मर जाऊँ और कभी एक गरीब स्त्री तुम्हारे घर आए तो उसका विनयपूर्वक स्वागत करना। यदि उसकी नाक बहती हो तो उसे अपने आँचल से पोंछना। जब कभी दशामाता के गंडे पड़े तब उनको अवश्य लेना और श्रद्धा पूर्वक उनकी पूजा करना। जब कभी तुम पर कोई संकट आ पड़े तब सुहागिनें न्यौतना। दशा माता की कृपा से तुम्हारी सभी इच्छाएँ पूरी होंगी।
कुछ दिनों बाद बुढ़िया की मृत्यु हो गई। तब दशामाता ने सोचा कि चलकर देखना चाहिए कि अब बहू सास के वचनों का पालन करती है या नहीं। अब दशामाता एक बूढ़ी भिखारी का वेश धारण कर उनके घर गई। उन्हें देखते ही बहू उठकर खड़ी हो गई। पांव छुए और दंडवत प्रणाम किया। अपने बालक को उनकी गोदी में डाल दिया। बहू की ऐसी श्रद्धा भक्ति देखकर, दशा माता ने बहू को आशीर्वाद दिया। दशा माता बोली कि, “तेरी धर्मबुद्धि हो। भगवान सदैव तेरा भला करेंगे। तेरा भंडार भरपूर रहेगा। कभी किसी भी बात की चिंता तुझे नहीं रहेगी। जो इच्छा करेगी सो फल पाएगी।”
हे दशामाता जैसी कृपादृष्टि आपने ब्राह्मणी और उसकी बहू पर की ,वैसी ही सब भक्तों पर करना।
सीखें
- ईमानदारी और परोपकार का फल मीठा होता है।
- भगवान की कृपा से जीवन में सफलता मिलती है।
- गरीबों की मदद करना पुण्य का काम है।
- सच्ची भक्ति और श्रद्धा से भगवान प्रसन्न होते हैं।
- आपके कर्म आपके भविष्य को निर्धारित करते हैं।
