एक राजा की दो रानियाँ
एक राजा के दो रानियाँ थीं। राजा की अति प्यारी रानी का नाम लक्ष्मी था। राजा की दूसरी रानी पटरानी जिसका नाम कुलक्ष्मी था। एक दिन लक्ष्मी रानी , मलिन वस्त्र पहन कर कोप भवन में जा बैठी।
कुलक्ष्मी का देश निकाला
राजा ने लक्ष्मी से पूछा कि तुम क्या चाहती हो? वह बोली कि कुलक्ष्मी रानी को देश निकाला दे दो। राजा लोक-लज्जा के कारण रानी कुलक्ष्मी को सहसा निकाल सकने से लाचार था। उसने उसे उसके पीहर भेजने का बहाना किया। उन्होंने रानी को एक पालकी में सवार कराया, और खुद घोड़े पर सवार होकर साथ चले।
एक सघन वन में पहुँचकर राजा ने पालकी रखवा दी, और कहारों को वहाँ से हटा दिया। इसके बाद वे घोड़ा दौड़ाते हुए अपने महल में चले आये। कुलक्ष्मी रानी को जंगल में राजा का इंतजार करते हुए सवेरा हो गया। रानी को प्यास लगने लगी ।
दशा माता की कृपा
रानी ने एक सारस की जोड़ी को जाते देखा। वह उसी के पीछे-पीछे हो गई। कुछ देर बाद वह एक नदी के तट पर पहुँच गई। रानी ने स्नान किया और समीप ही पानी पीकर प्यास बुझाई। उसी नदी पर कुछ और स्त्रियाँ भी स्नान कर रही थीं। उन्होंने दशा माता के गंडे लिए। उनके पास एक गंडा अधिक था। उन्होंने रानी से गंडा लेने को कहा। रानी गंडा लेकर वापस डोली में आकर बैठ गई।
थोड़ी देर में दशा माता एक बुढ़िया का भेष बनाकर रानी के पास आई। बुढ़िया ने रानी से पूछा कि वह यहाँ क्या कर रही है?
रानी ने बुढ़िया से पूछा कि आप कौन हो? बुढ़िया ने कहा कि मैं तेरी मौसी हूँ। रानी उसके गले से लिपटकर रोने लगी। उसने अपनी कहानी बुढ़िया को कह सुनाई।
दशा माता की कृपा से उसी जगह माया रच गई। रानी के सारे पीहर वाले, भाई और भाभी स्वयं ही प्रकट हो गए। रानी ने नौ दिन तक दशा माता की कथा कहानियाँ कहीं। दसवें दिन गंडे की पूजा होती थी। उसी दिन सवेरे दशा माता ने कहा कि तुम आज नदी में स्नान करने जाओगी, वहीं तुमको स्वर्ण कलश मिलेगा, उसको ले आना और जो डोली तुमको लेने के लिए आवे उसमें सवार हो जाना।
वह नदी में स्नान करने गई। वह स्नान करके निकली, तो किनारे दो सोने के कलश रखे दिखाई दिए। उनके पास ही सुंदर रेशमी वस्त्र भी रखे हुए थे। रानी ने वस्त्र बदले। तभी एक डोली सामने से आती दिखाई दी। रानी डोली में सवार होकर अपने घर आई। घर आकर रानी ने दशा माता के गंडे की पूजा की। सुहागिनों को भोजन कराया और पारणा किया।
राजा का पश्चाताप
फिर रानी अपने पीहर के परिवार में आनंद-पूर्वक हिल-मिलकर रहने लगी। सहसा राजा को रानी का स्मरण हुआ। वह चलता-चलता उस स्थान पर पहुँचा, जहाँ वह रानी का डोला रख आया था। परन्तु उसे देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि जहाँ सघन वन था, वहाँ सुंदर नगर बसा हुआ है। राजा के प्रश्न करने पर लोगों ने कहा कि वह कुलक्ष्मी रानी का नगर है। तब तो राजा और भी आश्चर्य में डूबा। महलों के पास जाकर इत्तिला कराई कि अमुक राजा मिलने आया है। रानी ने राजा को महल के भीतर बुलवाया, और एक कमरे में ठहराया। दोपहर को राजा भोजन करने गए। उनके साथ एक नाई भी था। वह भी राजा के पास ही बैठकर खाना खाने लगा। रानी, राजा और नाई को भोजन परोसने लगी।
पहली बार ज्योंही रानी ने नाई के सामने पत्तल रखी, तो नाई ने रायते का एक छींठा रानी के पैर पर डाल दिया। रानी को इस बात का पता नहीं पड़ा। दूसरी बार रानी परोसने आई तब दूसरी पोशाक पहनकर आई। राजा मन में सोचने लगा कि यह क्या है? यहाँ तो कई रानियाँ एक सी हैं। कमरे पर आकर राजा ने नाई से कहा कि, यहाँ तो कई रानियाँ हैं। यह कैसे मालूम हो कि अपनी रानी कौन सी है?
नाई बोला, कि रानी तो एक ही है, परन्तु वह पोशाक बदल-बदल कर परोसने आई थी। इससे आपको भ्रम हुआ है। राजा ने पूछा कि तूने कैसे जाना कि रानी एक ही है? वह बोला कि मैंने रानी के पैर पर रायते का छींठा डाल दिया था। जब दूसरी बार वह परोसने आई तब भी उसके पैर पर वही छींठा पड़ा था। और जब तीसरी बार आई, तब भी वह छींठा था।
इस बीच रानी ने राजा को अपने महल में बुलाया। वहाँ सेज सजी हुई थी। उसी पर राजा को बिठाकर उसे पान दिया। राजा लेट गया, रानी पैर दबाने लगी। तब राजा ने कहा कि रानी! बहुत दिन हो गए, अब राजधानी को चलो। रानी ने जवाब दिया कि मैं नहीं चलूँगी। आप तो मेरा सर्वनाश कर चुके थे। यह सब तो मेरी मौसी की बदौलत है कि मैं जीती बच गई। इस पर राजा ने पश्चाताप करते हुए माफ़ी माँगी।
तब रानी बोली कि केवल एक शर्त पर आपके साथ चल सकती हूँ। यह बाग-बगीचे आपकी राजधानी के समीप पहुँच जाएँ। जिससे मेरा जब जी चाहे, तो आपके महल में रहूँ और जब भी जी चाहे, तब मौसी के महल में चली जाऊँ। मेरी मौसी बड़ी दयावान और भोली-भाली है। राजा ने रानी की मौसी (दशा माता) के पास जाकर ज्योंही यह निवेदन किया, उसी समय दोनों शहर पास-पास हो गए। राजा ने दशा माता की कृपा का प्रभाव जानकर सारे नगर भर में ढिंढोरा पिटवाया कि, अब से सभी लोग दशा माता की पूजा किया करें।
भगवती दशा माता ने कुलक्ष्मी रानी पर जैसी कृपा की, वैसी आपत्ति में पड़ी हुई हर स्त्री पर दया करें।
सीखें
- ईश्वर की कृपा हमेशा सच्चे और निष्कपट लोगों पर होती है।
- किसे के दबाव में फैसला लेने से बचे क्योंकि वह फैसले हमेशा हानिकारक होते हैं।
- पश्चाताप और क्षमा मांगना जीवन में सुधार लाने का पहला कदम है।
- संकट के समय में धैर्य और आस्था जीवन रक्षक सिद्ध हो सकती है।
The King’s Two Queens
A king had two queens. The king’s most beloved queen’s name was Lakshmi. The king’s other queen, his second wife, was named Kulakshmi. One day, Queen Lakshmi, wearing soiled clothes, went and sat in the room of anger (a separate room in king’s palace in olden days where the queen goes when she is angry)
Kulakshmi’s Exile
The king asked her what she wanted. She said, “Exile Queen Kulakshmi.” The king, due to social stigma, was unable to immediately exile queen Kulakshmi. He made a pretense of sending her to her parental home. He had the queen placed in a palanquin and, riding his horse, accompanied her. Upon reaching a dense forest, the king had the palanquin left and dismissed the bearers. Then, riding his horse, he returned to his palace. Queen Kulakshmi waited till the morning for the king in the forest. She started feeling thirsty.
The Grace of Dasha Mata
The queen saw a pair of cranes. She followed them. After a while, she reached the bank of a river. The queen bathed and quenched her thirst by drinking water nearby. Some other women were also bathing in the same river. They had taken Ganda of Dasha Mata. They had one extra Ganda. They asked the queen to take it. The queen took the Ganda and sat back in the palanquin.
After a short while, Dasha Mata, disguised as an old woman, came to the queen. The old woman asked the queen what she was doing there. The queen asked the old woman who she was. The old woman said, “I am your aunt.” The queen hugged her and started crying. She told her story to the old woman.
By the grace of Dasha Mata, magic happened at that place. The queen’s entire family, her brother and sister-in-law, appeared there. Then the queen narrated the stories of Dasha Mata for nine days. On the tenth day, the worship of the Ganda was to be performed. That morning, Dasha Mata said, “You will go to bathe in the river today; there you will find a golden pot, bring it, and get into the palanquin that comes to take you.”
She went to bathe in the river. When she came out after bathing, two golden pots were visible on the river bank. Beautiful silk clothes were also placed nearby. The queen changed her clothes. Just then, a palanquin appeared from the front. The queen boarded the palanquin and came home. After arriving home, the queen performed the worship of the Dasha Mata’s Ganda. She fed the married women and performed the concluding ceremony.
The King’s Repentance
Then the queen happily lived there with her family. Suddenly, one day the king remembered the queen. Searching her, the king reached the place where he had left the queen’s palanquin. But he was greatly surprised to see that, where earlier there was a dense forest, now a beautiful city was built. Upon the king’s inquiry, the people said that it was the city of Queen Kulakshmi. Then the king was even more amazed. Going near the palace, he sent a word that a certain king had come to meet. The queen summoned the king inside the palace and lodged him in a room. In the afternoon, the king went to take lunch. He had a barber with him. The barber also sat down to eat with the king. The queen served food to the king and the barber.
The first time the queen placed a plate before the barber, the barber spilled a bit of yogurt onto the queen’s foot. The queen did not notice it. The second time the queen came to serve, she came wearing a different outfit. The king wondered in his mind on how this was possible? There are several queens out there who look exactly same ? After taking the lunch the king came back to the room. Now the king asked the barber, “There are several queens here. How can it be known which one is my queen?”
The barber was intelligent and said, “There is only one queen here, but she came to serve us wearing different clothes. Due to this you are feeling confused.” The king asked, “How did you know that there is only one queen?” The barber smartly replied, “I had spilled some yogurt onto the queen’s foot when she came to serve the first time. Later when she came to serve the second time, the same yogurt was still on her foot. And when she came the third time, the yogurt was still there.”
Meanwhile, the queen called the king to her palace. A bed was decorated. The king was seated on the bed and the queen gave him betel leaves to eat. The king laid down, and the queen started massaging his feet. Then the king said, “Queen! It’s been a long time, let’s go back to our palace!” The queen replied, “I won’t go. You had destroyed my life. I survived due to the blessings of my aunt” At this, the king repented and apologized.
Then the queen said, “I can only go with you on one condition. This garden and city should shift from here to a place near your capital. So that anytime I want I can come back to stay in my aunt’s palace. My aunt is very kind and innocent.”
The king went to Dasha Mata (who is queen’s aunt) and requested her to shift the palace from there. On king’s request, both cities became close to each other. Knowing the effect of Dasha Mata’s grace, the king made an announcement throughout the city, that from now on, everyone should worship Dasha Mata.
May Goddess Dasha Mata show mercy on every woman in distress as she did on Queen Kulakshmi.
Lessons
- God’s grace is always upon the truthful and sincere.
- Never make decisions under pressure from someone. Such decisions are always harmful.
- Repentance and asking for forgiveness is the first step in improving life.
- Patience and faith can prove life-saving during crisis.