सात लड़कियों की कहानी
सात लड़कियां थीं। उनमें एक लड़की गरीब और बाकी छह धनवान घर से थीं। छह लड़कियों ने व्रत करने की ठानी और सातवीं लड़की को भी व्रत करने को कहा। सातवीं लड़की ने व्रत करने से मना कर दिया। तो सभी लड़कियां उसके घर गईं। उसकी मां से अपनी बेटी को व्रत करवाने के लिए कहने लगी।
माँ की चिंता
माँ ने कहा, “देखो बेटा, मेरे घर में खाने को कुछ नहीं है, मेरी बेटी व्रत कैसे करेगी?”
तब वे सारी सहेलियाँ बोलीं, “देखो माँ, एक-एक दिन ये हमारे घर खाना खाएगी, तो ही इसके व्रत पूर्ण हो जाएँगे। व्रत के लिए मना मत करो।” और वे सभी सहेलियाँ तभी मानीं जब माँ अपनी बेटी को व्रत करवाने को तैयार हो गई।
छओं लड़कियों का सातवीं लड़की के घर खाना खाने की जिद करना
बेटी एक-एक दिन सभी सहेलियों के घर खाना खाती। ऐसे करके छह दिन निकल गए। सातवें दिन सभी लड़कियाँ उसके पीछे पड़ गईं कि, कल हम सब तुम्हारे घर खाना खाएँगे। लड़की बोली, “मैंने पहले तुम्हें मना किया था।” पर लड़कियाँ मानी नहींं। तब सातवीं लड़की बाकी सभी लड़कियों को अपने घर खाना खिलाने को तैयार हुई। घर आकर वह अपनी माँ से बोली, “माँ कल सब लड़कियाँ अपने घर खाना खाने आएंगी।”
तब माँ ने कहा, “बेटी, मैंने तुझे पहले ही कहा था कि उन लड़कियों की बात मत सुन, अपने घर में खाने को है ही नहीं।” माँ को गुस्सा आया और वो अपनी लड़की को मारने लगी। लड़की रोती हुई जंगल में जाकर सो गई।
सातवीं लड़की का जंगल में शिव पार्वती से मिलना
उधर से ईसर (श्री शिव जी भगवान) पार्वती जी निकले। पार्वती जी ईसरजी से बोलीं, “देखो महादेव जी कोई तो अपनी शरण में आई है।” ईसरजी ने कहा, “दुनिया में बहुत लोग हैं, किस-किस को देखें?” पार्वती जी बोलीं, “नहीं ईसरजी इसको तो आपको पूछना ही पड़ेगा, इसको नहीं पूछोगे तो दुनिया में कौन पूछेगा?” ईसर-पार्वतीजी उस लड़की के पास आए।
पार्वती जी ने पूछा, “ब्राह्मण की बेटी, सो रही है या जाग रही है? किस चिंता में पड़ी है?”
लड़की बोली, “मेरे घर में खाने को नहीं है। मैंने गौर (गणगौर) के व्रत किए। छह दिन, छह लड़कियों के घर खाना खाने गई। अब छह लड़कियाँ मेरे घर खाना खाने आएंगी। मैं उनको क्या खिलाऊँगी ? इस चिंता में मैं पड़ी हूँ।”
ईसर पर्वतीजी की सातवीं लड़की पर कृपा
ईसर-पार्वती को उस पर दया आई ।
उन्होंने कहा, “जा, यहाँ के कंकड़, पत्थर, कैर (एक प्रकार की सब्जी) , सांगरिया (एक प्रकार की सब्जी) इकट्ठी कर ले। घर के चारों कोनों में थोड़े-थोड़े डाल देना। और थोड़े-थोड़े पालने में डाल देना।”
लड़की ने जितना उठा, उतना बटोर लिया, और घर ले चली। पार्वती जी ने उसकी टोकरी के हाथ लगा दिया। उसने घर पहुँच कर जैसा पार्वती जी ने कहा वैसा ही किया और सो गई। सवेरे माँ ने बेटी से पूछा, “लड़कियों को क्या खिलाएगी?”
बेटी कहने लगी, “माँ कमरा खोलकर देख लो।” माँ ने कमरा खोला तो चकित रह गई, वहाँ हीरे मोती जगमग कर रहे थे। माँ ने कहा, “बेटी ये सब कहाँ से लाई?” बेटी बोली, “माँ ईसर पार्वती ने मुझ पर कृपा की, भगवान मुझ पर प्रसन्न हुए हैं।” माँ उनमें से एक हीरा बाजार में लेकर गई। उसे बेचा और सारा सामान लाई, रसोई बनाई। सारी लड़कियाँ खाना खाने आईं और उन्होंने देखा कि उस लड़की के घर में बहुत ठाट-बाट है। छओं लड़कियों को सातवीं लड़की के घर पर बहुत मजा आने लगा। वे वहीं पर खाना खाकर खेलने लगी।
छह लड़कियों की माताओं का सातवीं लड़की के घर आना
शाम तक छह लड़कियाँ अपने-अपने घर नहीं गईं। अब उन लड़कियों की माताओं को चिंता हो गई। उन्होंने सोचा कि हमारी लड़कियाँ भूखी होंगी। तो वे थोड़ा-थोड़ा खाना लेकर सातवीं लड़की के यहाँ पहुँचीं। वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि सभी लड़कियाँ आनंद से खेल रही हैं। सभी लड़कियों की माताएँ पूछने लगीं कि, तेरे घर में कल तक तो कुछ नहीं था। आज ये वैभव कहाँ से हो गया? तो लड़की ने कहा कि, मेरे ऊपर तो ईसर गौर जी प्रसन्न हुए हैं। और उसने सारी बात बता दी।
इर्ष्या और उसके दुष्परिणाम
ऐसा सुनकर उनमें से एक लड़की की माँ के मन में ईर्ष्या हुई। और वो भी अपनी बेटी से बोली, “तू भी जंगल में जाकर सो जा, ईसर-गणगौर अपने को भी धन देंगे।” बेटी ने मना किया पर उस लड़की की माँ नहीं मानी।
आखिर बेटी को जाना पड़ा। वो भी जंगल में जाकर सो गई। ईसर जी उसके सपने में आए और बोले, “बेटी तू सो रही है, या जाग रही है?” बेटी बोली कि मैं चिंता में हूँ। मैंने लड़कियों को अपने घर खाना खाने बुलाया है। पर मेरे घर में कुछ नहीं है। तो ईसर जी ने कहा, “सुबह उठकर बगीचे से कैर-सांगरिया ले जाना।”
वो उसी समय उठी। और जंगल के कैर सांगरिया ले जाकर माँ को दिये । माँ को कहा कि लड़कियाँ खाना खाने आएंगी। इन कैर सांगरियों को उबाल कर रख देना। लड़कियों को खाना खाने को बोला।
लड़कियाँ कहने लगीं, “तूने एक बार खाना खिला तो दिया अब क्या है?” वो मानी नहीं और सबको कह आई। माँ ने कैर सांगरियों को उबाल कर रख दिया। बेटी ने बर्तन का ढक्कन खोला तो डर गई। उसमें तो साँप, बिच्छू भरे पड़े थे। वो घबरा कर ब्राह्मण की लड़की के पास गई और बोली, “तुम्हारे घर में बहुत सारा धन हो गया। लेकिन मेरे घर में साँप, बिच्छू कैसे हो गए?”
ब्राह्मण की लड़की की माँ बोली, “भगवान भूखे पर कृपा करते हैं, जिसके पास सब कुछ है उस पर नहीं।” ब्राह्मण की लड़की की सहेली उसकी माँ के पैर पड़ गई। माँजी बोली, “मेरे पैर मत पकड़। ईसर गौरी के पैर पकड़।”
तब वो लड़की ईसर गौरी के पास गई। ईसर जी ने कहा कि तेरे धन में से आधा धन ब्राह्मण की बेटी को दे देवें, तो मैं ये माया समेटूँगा। वो घर गई। उसने अपना आधा धन ब्राह्मण की बेटी को दे दिया। फिर भी उसके घर में एक साँप रह गया। वो वापस ईसर जी के पास गई। ईसर जी बोले कि तेरे पास अब भी दो सुइयाँ बची हैं। उसमें से एक सुई ब्राह्मण की बेटी को दे दो तो बचा हुआ साँप भी खत्म हो जाएगा। उस लड़की ने ऐसा ही किया। ऐसा करने पर सभी जगह शांति हो गई।
हे पार्वती माता, जैसे आपने ब्राह्मण की बेटी पर कृपा करी वैसे सब पर प्रसन्न रहना। जैसे उसकी सहेली पर रूठे वैसे किसी पर मत रूठना।
सीखें
- ईश्वर की कृपा सभी पर होती है, लेकिन भूखे और जरूरतमंद पर ज्यादा।
- ईर्ष्या और लालच का परिणाम बुरा ही होता है।
