कामदा एकादशी व्रत कथा
एक पवित्र कथा जो भगवान श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को बताई गई थी
युधिष्ठिर की जिज्ञासा
एक बार युधिष्ठिर जी ने, भगवान श्रीकृष्ण से, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली, कामदा एकादशी के बारे में वर्णन करने के लिए प्रार्थना की।
भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर जी को बताया की, यह कथा वशिष्ठजी ने दिलीप जी के पूछने पर कही थी।
नागपुर का वर्णन
प्राचीन काल की बात है। नागपुर नाम का एक सुंदर नगर था। जहाँ सोने के महल बने हुए थे।
वहाँ पुंडरिक आदि महा भयंकर नाग निवास करते थे। पुंडरिक वहाँ का राजा था। गंधर्व, किन्नर और अप्सराएँ भी उस नगर में आते जाते रहते थे।
वहाँ एक अप्सरा थी, जिसका नाम ललिता था। उसके साथ ललित नाम का एक गंधर्व भी था। वे दोनों पति पत्नी थे। और एक दूसरे से बहुत प्रेम करते थे।
राजा पुंडरिक का श्राप
एक दिन की बात है, पुंडरिक राज सभा में बैठकर मनोरंजन कर रहा था। वहाँ ललित गाना गा रहा था। गाते गाते उसे ललिता का स्मरण हो आया। और उसके पैर रुक गए, और जीभ लड़खड़ाने लगी।
इस बात से पुंडरी्क क्रुद्ध हो गया। और उसने ललित को श्राप दिया कि वह राक्षस हो जाए।
उसी पल से ललित एक भयंकर रूप वाला राक्षस हो गया। ललिता अपने पति की विकराल आकृति देखकर बहुत चिंतित हुई। वह रोती रोती घने जंगलों में अपने पति के पीछे पीछे घूमने लगी।
मुनि से मिलन
घने जंगल में एक मुनी बैठे हुए थे। ललिता उनके पास गयी और उनको प्रणाम किया। मुनि ने उसको दुखी देखकर उससे पूछा कि, वो कहाँ से आयी है? और उसे क्या दुख है?
ललिता ने बताया कि वह वीरधनवा नाम के एक गंधर्व की पुत्री है। फिर उसने अपने पति ललित की पाप दोष के कारण, राक्षस बनने की कथा ऋषि को बतायी। फिर उसने इस पाप से छुटकारा पाने का उपाय भी पूछा।
एकादशी व्रत का उपदेश
ऋषि बोले की, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की कामदा एकादशी तिथि का तुम व्रत करो, और उस व्रत का जो पुण्य है, उसे अपने स्वामी को दे डालो। पुण्य देने पर थोड़ी ही देर में उनका श्राप दूर हो जाएगा।
ललिता ने एकादशी का उपवास किया। फिर द्वादशी के दिन, ब्रह्मऋषि के समीप भगवान श्री हरि विष्णु के समक्ष, अपने पति के उद्धार के लिए प्रार्थना की।
श्राप से मुक्ति
उस व्रत के पुण्य के प्रभाव से, ललित का राक्षस भाव चला गया। और वह पुन गंधर्व हो गया। दोनों पति पत्नी व्रत के प्रभाव से पहले से भी ज्यादा शोभा पाने लगे।
कामदा एकादशी का महत्व
कामदा एकादशी, ब्रह्महत्या आदि पापों और पिशाचत्व आदि दोषों को नष्ट करने वाली है। इसके पढ़ने और सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है।
