सफला एकादशी
भगवान श्री कृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को बताई गई पौष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी की कथा
सफला एकादशी का महत्व
पौष मास के कृष्ण पक्ष में सफला एकादशी होती है। उस दिन विधिपूर्वक भगवान श्री हरि नारायण की पूजा करनी चाहिए। एकादशी के दिन नाम मंत्रों का उच्चारण करके फलों के द्वारा श्रीहरि का पूजन करें।
पूजा में प्रयोग किए जाने वाले फल
नारियल
सुपारी
बिजौरा नींबू
ज़मीरा नींबू
अनार
आंवला
लोंग
बेर
आम
दीपदान का महत्व
इस दिन दीपदान का बड़ा महत्त्व है। रात को जागरण करें। जागरण करने वाले को 1000 वर्षों की तपस्या के समान फल की प्राप्ति होती है।
सफला एकादशी की कथा
चम्पावती नगरी और राजा महिष्मत
किसी समय में चम्पावती नाम की एक नगरी थी। वहाँ राजा महिष्मत राज्य करता था। राजा के पांच पुत्र थे। उनमें जो सबसे बड़ा था, वह सदा पाप कर्म में ही लगा रहता था।
उसने पिता के धन को पाप कर्म में ही खर्च कर दिया। वह ब्राह्मणों की निंदा करता था, एवं देवताओं को भी हमेशा बुरा भला कहता था। अपने पुत्र को ऐसा पापाचारी देखकर राजा को बड़ा दुख हुआ।
लुम्भक का निष्कासन
इसी कारण राजा ने उसका नाम लुम्भक रख दिया। और उसे राज्य से बाहर निकाल दिया। लुंभक उस नगर को छोड़कर वन में चला गया। वहाँ रहकर उस पापी ने समुचित नगर का धन लूट लिया।
एक दिन जब वह चोरी करने के लिए नगर में आया तो सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया। किंतु उसने अपने आप को राजा महिष्मत का पुत्र बताया तो सिपाहियों ने उसे छोड़ दिया।
वन में जीवन
फिर वह वापस वन में लौट आया, और रोज़ मांस तथा वृक्षों से फल खाकर जीवन निर्वाह करने लगा। वन में वह एक वर्षों पुराने पीपल के वृक्ष के नजदीक रहता था। उस वन में उस पीपल के वृक्ष को एक महान देवता माना जाता था।
अनजाने में एकादशी व्रत
एक दिन किसी संचित पुण्य के प्रभाव से, उसके द्वारा एकादशी के व्रत का पालन हो गया। पौष मास में कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन, लुम्बक ने वृक्षों से फल खाये और वस्त्रहीन होने के कारण रातभर जाड़े का कष्ट भोगा। उस समय न तो उसे नींद आयी और न ही उसे कोई आराम मिल पाया।
सूर्योदय होने पर भी उसे होश नहीं आया। वह बेहोश ही पड़ा रहा। दोपहर होने पर उसे वापस होश आया। वह किसी तरह उठा और वन के भीतर गया। वह भूख से पीड़ित हो रहा था। वहाँ से उसने कुछ वृक्षों के फल इकट्ठे किए। और अपने पीपल के पेड़ के पास लौट आया।
भगवान विष्णु को फल अर्पण
उसने पीपल के पेड़ की जड़ों में बहुत से फल रखते हुए निवेदन किया कि इन फलों से भगवान विष्णु संतुष्ट हों। ऐसा कहकर लुम्बक ने रात भर नींद नहीं ली। इस तरह अनजाने में ही उससे एकादशी के व्रत का पालन हो गया। सहसा आकाशवाणी हुई।
दिव्य वरदान
राजकुमार। तुमने सफलतापूर्वक सफला एकादशी का व्रत संपूर्ण किया है। इसके प्रसाद से तुम राज्य और पुत्र प्राप्त करोगे। उसने वह वरदान स्वीकार किया और इसके बाद उसका रूप दिव्य हो गया। उसकी बुद्धि भी उत्तम हो गयी और वो भगवान श्री हरि विष्णु के भजन में लग गया।
राज्य और पुत्र प्राप्ति
इसके फलस्वरूप उसने अगले 15 वर्षों तक राज्य किया और उस का सफलतापूर्वक संचालन किया। उसके बाद भगवान श्री हरि विष्णु की कृपा से उसके मनोज्ञ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। जब वह पुत्र बड़ा हुआ तो लुम्बक ने राज्य पुत्र को सौंप दिया और वह भगवान श्रीविष्णु की समीप चला गया।
सफला एकादशी का फल
इस प्रकार जो सफला एकादशी का व्रत करता है वह इस लोक में सुख पाकर मरने के पश्चात मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। इस व्रत की महिमा को पढ़ने, सुनने और उसके अनुसार आचरण करने से मनुष्य राजसूय यज्ञ का फल प्राप्त करता है।
भक्ति
शांति
मोक्ष
|| हरि ॐ तत्सत ||
