एक माँ और बेटी की कहानी
एक माँ बेटी थी | माँ गायें चराने जाती थी | चैत्र का महीना आया, सूरज रोंठा का रविवार आया | माँ ने बेटी से कहा, बेटी ! आज तेरे व मेरे लिये दो रोंठ बना लें | मैं गाय चराकर आती हूँ, फिर तू और मैं दोनों पूजा करेंगे |
जोगी का आगमन और बेटी का कर्म
बेटी ने माँ के निमित्त एक रोंठ तैयार किया। इतने में सूरज भगवान जोगी का वेष धारण कर आये और बोले “माई भिक्षा दे |” बेटी ने कहा “मेरा रोंठ अभी सिका नहीं, तो जोगी ने कहा मैं जाता हूं | बेटी ने सोचा जातक खाली नहीं जाना चाहिये, और उसने माँ के रोंठ में से किनार तोड़ करके जोगी को थोड़ा रोंठ दे दिया |
माँ का क्रोध और बेटी की परीक्षा
माँ गाय चराकर आई | बेटी से बोली “मेरा रोंठ कहां है ?” खंडित रोंठ देखकर मां बावली हो गई | वो “घी रोठो दे , रोठा मयली करो दे” (रोठे के साथ घी दो, और रोठे को नरम कर दो), कहती नगरी में घूमने लगी | बेटी डर के मारे पीपल के झाड़ पर बैठ गई | तीन चार दिन निकले बेटी भूखी, प्यासी बैठी रही। सूरज भगवान को उस पर दया आई। सूरज भगवान ने उसके लिये पानी का लोटा व चूरमा भेज दिया |
राजा का कंवर और बेटी का विवाह
एक दिन एक राजा का कंवर शिकार करने आया और, उसी पीपल की ठंडी छाया में बैठा और बोला “कितना अच्छा होता कि पीने को थोड़ा पानी मिल जाता |” ऐसा सुनते ही लड़की ने थोड़ा पानी डाला | फिर राजा के कंवर ने कहा “मुझे बहुत भूख लगी है कोई खाने को दे तो अच्छा होगा |” तो लड़की ने ऊपर से चूरमा डाला | कंवर की भूख प्यास मिट गई। वो विचार करने लगा की जरूर यहाँ कोई है | ये सोचकर राजा के कंवर ने अपने सिपाहियों को पीपल के पेड़ पर खोज करने भेजा| उन्होंने सब जगह देखा, उन्हें कुछ नहीं मिला। तब राजा का कंवर खुद ऊपर चढ़ा, और ढूंढा तो वो लड़की मिली | राजकुमार ने कहा तू कौन है ? तब लड़की ने अपनी कहानी सुनाई | राजा के कंवर ने कहा मेरे साथ शादी करोगी ? तो लड़की बोली आप तो नगरी के राजा हो, मैं तो गरीब व अनाथ लड़की हूं | मेरे कोई नहीं है | राजा का कंवर माना नहीं | गाजे-बाजे के साथ उस कन्या से पीपल के नीचे ब्याह कर घर ले गया |
सातवें कमरे का राज़
बहुत दिन बीते एक दिन लड़की की माँ घूमती-घूमती महल के बाहर पहुंच गई। और आवाजें देने लगी ” घी रोठो दे , रोठा मयली करो दे|” बेटी छत पर खड़ी देख रही थी | रानी ने सिपाहियों को भेजकर माँ को बुलाया और एक कमरे में ठहराया | कमरा बन्द कर दिया | एक दिन राजा जी ने सारी चाबियां मांगी। रानी ने 6 कमरे की चाबियां दे दी, सातवें कमरे की चाबी नहीं दी। राजा ने जिद करके सातवें कमरे की चाबी लाकर सातवां कमरा भी खोला। सातवें कमरे में सोने की शिला देखी। राजा ने रानी से पूछा ये क्या है? रानी ने कहा ‘मेरे पीहर की भेंट है’। राजा बोले “हमको आपका पीहर देखना है।” रानी ने कहा “मेरे पीहर नहीं है”। आप तो मुझे पीपल के पेड़ के नीचे से ब्याह कर लाये थे।
सूरज भगवान का रानी की मदद करना
राजा हठ करने लगे तो रानी सूरज भगवान से विनती करनी लगी, और सवा प्रहर (एक घंटा और पंद्रह मिनट) का पीहर वासा (पिता का घर) मांगा। फिर राजा-रानी पीपल के पेड़ के नीचे आये। वहाँ सारा कुटुम्ब था। कोई कहे मासाजी आया, कोई कहे जीजाजी आया, तो कोई कहे फूफाजी आया। राजा-रानी का अच्छा सत्कार हुआ। राजा को रानी का परिवार देख कर बहुत आनंद आया। एक प्रहर पूरा हुआ तो रानी घर चलने को कहने लगी। राजा बोला इतना बढ़िया ससुराल इतनी जल्दी नहीं छूटेगा । अब रानी क्या करे ? सूरज भगवान से सिर्फ एक घंटा पंद्रह मिनट की बात हुई थी, और एक घंटा बीत चुका था। रानी ने राजाजी को जल्दी ले कर जाने का तरीका सोचा। अब तो रानी छोटे कुंवर के चिकोटी काटने लगी। उसे रूलाने लगी और राजा से कहा मेरे तो कुंवर रो रहा है, आप राजा जी यहाँ से चलो। राजा-रानी को पीहर वालों ने खूब उपहार दिये और विदा किया। जल्दी में राजा जी अपने पैरों की मोचड़ी (जूती) व घोड़ी का ताजना (घोड़ी को सजाने का सामान) वहीं भूल गये। थोड़ा आगे जाते ही याद आई, तो सिपाहियों से कहा रथ वापस घुमाओ, मेरी पैरों की मोचड़ी व घोड़ी का ताजना वहीं रह गई है। रानी कहने लगी इतनी सी चीज के पीछे वापस क्यों जाते हो, इतना धन उन्होंने वैसे ही दे दिया है।
रानी का भेद खुलना
राजा ने रानी की एक नहीं सुनी। जब वे पीपल के वृक्ष के नीचे गये तो देखा की वहाँ राजा जी का सामान पड़ा है, पर कोई परिवार नहीं है। राजा बोले – रानी ये सब क्या है? रानी बोली “मैंने सूरज भगवान से सवा प्रहर का पीहरवासा मांगा था । मेरी तो एक ही मां है। जिसका रोठा खंडित होने से वो पागल हो गई। घूमते-घूमते महल के नीचे आई, तो मैंने उसे बुलाकर कमरे में बन्द कर दिया। उसकी सोने की शीला हो गई। यह कह कर रानी रोने लगी। सूरज भगवान ने देखा तो उन्हें लड़की पर दया और बड़ा प्रेम आया। उन्होने रानी से कहा की तूने रोठा खंडित एक भले काम के लिए अर्थात भूखे योगी की भूख मिटाने के लिए किया था। सूरज भगवान ने उसे वरदान दिया की, जब तू महल वापस पहुंचेगी, तो तुझे तेरी माँ सही सलामत मिलेगी।
रानी की कहानी सुनने पर राजा ने नगर में ढिंढोरा पिटवाया कि चैत्र के किसी भी रविवार को पीहर वासे के लिए सूरज भगवान का व्रत करना चाहिये। जैसे- सूरज भगवान ने रानी पर प्रसन्न हो उसे पीहरवासा दिया, वैसे सब पर सूरज भगवान कृपा करें। सूरज भगवान की जय।
सीखें
- दया और परोपकार का महत्व
- ईश्वर की कृपा का विश्वास
- सच्चे दिल से किये गये कर्म का फल
- माता-पिता का सम्मान
- संकट में धैर्य और आशा
