माघ माह में शुक्ल पक्ष सप्तमी को रथ सप्तमी या माघ सप्तमी या सूर्य सप्तमी के नाम से भी जाना जाता है।
सूर्य सप्तमी की कथाएँ
इसके पीछे विभिन्न पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं जो इस प्रकार हैं ,
प्रथम कथा
एक बार युधिष्ठिर ने भगवान श्रीक़ृष्ण से पूछा की कलयुग में कोई स्त्री कैसे अच्छे पुत्र वाली हो सकती है । तब श्रीक़ृष्ण ने प्राचीन काल में इन्दुमति नाम की एक वैशय्या की कहानी सुनाई । उस वैशय्या ने ऋषि वशिष्ठ के पास जाकर कहा की मैंने आज तक कोई धार्मिक कार्य नहीं किया है । कृपा कर मुझे बताएं की मुझे मोक्ष कैसे मिलेगा ।
ऋषि वशिष्ठ ने उसे बताया की स्त्रियों को मुक्ति, सौभाग्य ऐव सौन्दर्य देने वाला अचला सप्तमी / सूर्य सप्तमी से बड़ कर कोई व्रत नहीं है । तुम इस व्रत को माघ शुक्ल सप्तमी के दिन करो, इससे तुम्हारा कल्याण होगा ।
इन्दुमति ने वह व्रत किया और इसके प्रभाव से शरीर छोड़ने पर वह स्वर्गलोक को गयी और वहाँ समस्त अप्सराओं की नायिका बन गयी ।
द्वितीय कथा
भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र शाम्ब को अपने शारीरिक बल पर बहुत अभिमान हो गया था। एक बार दुर्वासा ऋषि भगवान श्रीकृष्ण से मिलने आए। वे बहुत अधिक दिनों तक तप करके आए थे और इस कारण उनका शरीर बहुत दुर्बल हो गया था।
शाम्ब उनकी दुर्बलता का मजाक उड़ाने लगा और उनका अपमान भी किया इसे बात से क्रोधित होकर दुर्वासा ऋषि ने शाम्ब को कुष्ठ होने का श्राप दे दिया।
शाम्ब की यह स्थिति देखकर श्रीकृष्ण ने उसे भगवान सूर्य की उपासना करने को कहा। पिता की आज्ञा मानकर शाम्ब ने भगवान सूर्य की आराधना करना प्रारंभ किया, ऐसा करने से कुछ समय में ही कुष्ठ रोग ठीक हो गया।
इसलिए जो श्रद्धालु सप्तमी के दिन भगवान सूर्य की आराधना करता है। उन्हें आरोग्य, पुत्र और धन की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में सूर्य को आरोग्यदायक कहा गया है तथा सूर्य की उपासना से रोग मुक्ति का मार्ग भी बताया गया है।
तृतीय कथा
कम्बोज साम्राज्य के राजा यशोवर्मा द्वारा एक कथा का वर्णन किया गया है, जो एक महान राजा था, जिसका उसके राज्य पर शासन करने के लिए कोई उत्तराधिकारी नहीं था। ईश्वर से विशेष प्रार्थना करने पर उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। राजा की मन्नत यहीं समाप्त नहीं हुई, क्योंकि उसका पुत्र गंभीर रूप से बीमार था। राजा के पास गए एक संत ने सलाह दी कि उनके बेटे को अपने पिछले पापों से छुटकारा पाने के लिए श्रद्धा के साथ रथ सप्तमी व सूर्य सप्तमी की पूजा करनी चाहिए। एक बार जब राजा के पुत्र ने ऐसा किया, तो उनका स्वास्थ्य ठीक हो गया और उन्होंने अपने राज्य पर अच्छी तरह से शासन किया।
सूर्य जयंती
इस दिन को भगवान सूर्य के जन्म दिवस से रूप में मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इसी तिथि पर सूर्य देव ने पूरे विश्व को रोशन करना शुरू किया था, इसलिए इस दिन को सूर्य जयंती के रूप में भी मनाया जाता है।
पूजा विधि
रथ सप्तमी के दिन सुबह जल्दी उठ कर स्नान करना चाहिए। स्नान करने के बाद सूर्योदय के समय भगवान सूर्य को अर्घ्य दें । इसके साथ ही पूजा के दौरान सूर्य देव को लाल फूल अर्पित करें।
इस दिन निम्न में से किसी से भी सूर्य भगवान की पूजा कर सकते हैं
- सूर्य चालीसा का पाठ करें
- आदित्य हृदय स्तोत्रम का पाठ करें
- गायत्री मंत्र का जाप करें
- और फिर सूर्य देवता की आरती कर दें.
सूर्य सप्तमी पर तांबे, तिल, गुड़, लाल वस्त्र, लाल फूल का दान करें, इससे सूर्य संबंधित दोष दूर होता है. इस दिन अपने पिता की सेवा करें. मान्यता है कि कुंडली में सूर्य को मजबूत करने के लिए घर की पूर्व दिशा को वास्तु के अनुसार व्यवस्थित करके रखें. इससे भी सूर्य शांत रहेंगे और शुभ फल मिलता रहेगा.
इस दिन भगवान सूर्य की विधि-विधान पूर्वक पूजा करने से साधक को आरोग्य के साथ-साथ समृद्धि की भी प्राप्ति होती है। इससे शारीरिक चर्मरोग आदि विकार नहीं होते हैं। इस दिन पर भगवान सूर्य के निमित्त व्रत करने से सभी पापों का नाश होता है।