यह कथा बताती है कि हमारी धरती को ‘पृथ्वी‘ क्यों कहा जाता है – एक प्राचीन गाथा जो राजा पृथु के साथ जुड़ी है।
आरंभ – अंग और बेन
स्वयंभुव मनु के वंश में अंग नामक प्रजापति थे जो मनु के वंशज थे।
अंग ने मृत्यु की कन्या सुनीथा से विवाह किया।
उनसे बेन नामक पुत्र हुआ जो अधर्मी था।
अधर्म का अंत
बेन सदा अधर्म में लगा रहता था। महर्षियों ने उसे समझाया पर उसने नहीं माना।
अशुद्ध अन्तःकरण के कारण ऋषियों ने शाप देकर उसे मार डाला।
राज्य में अराजकता के भय से पीड़ित होकर पापरहित ब्राह्मणों ने वेन के शरीर का बलपूर्वक मन्थन किया।
राजा पृथु का प्रादुर्भाव
मंथन से सबसे पहले उसकी पाप प्रवृत्ति शरीर से निकली जिससे जंगली जातियाँ बनीं।
उसके बाद उसके दाहिने हाथ से दिव्य तेजोमय पुरुष का प्रादुर्भाव हुआ।
वे दिव्य पुरुष धनुष और बाण तथा गदा धारण किए हुए थे। वे आभूषणो से सुसज्जित और रत्नमय कवच धारण किए हुए थे।
वह साक्षात् भगवान विष्णु के अंश थे। उनका नाम रखा गया ‘पृथु‘। ब्राह्मणों ने उन्हें राज्य पर अभिषिक्त किया।
धर्म का संकट
राजा बनने के बाद पृथु ने देखा की धरती से धर्म उठ गया था। कहीं स्वाध्याय नहीं होता था। यज्ञादि भी नहीं होते थे।
तब राजा पृथु क्रोध में आकर अपने बाण से पृथ्वी को विदीर्ण करने के लिये उठ खड़े हुए।
पृथ्वी का संवाद
यह देख पृथ्वी गौ माता का रूप धारण करके भाग खड़ी हुई। उसे भागते देख पृथु ने भी उसका पीछा किया।
तब एक स्थान पर रुक कर पृथ्वी ने कहा की, “राजन्! मेरे लिये क्या आज्ञा है?”
पृथु ने जवाब दिया की “सुव्रते! सम्पूर्ण जगत एवं जीव जंतुओं के लिये जो अभीष्ट वस्तुएँ हैं, उसे शीघ्र प्रस्तुत करो।”
पृथ्वी ने कहा की, “अगर आप सही तरीके से मुझे ‘दुहेंगे’ अर्थात सही तरीके काम में लेंगे, तो मैं वो सब कुछ दूँगी जिसकी आपको ज़रूरत है।”
पृथ्वी का दोहन
अन्न और फसलें
राजा पृथु ने स्वायम्भुव मनु के अनुभव और ज्ञान का उपयोग किया। धरती से पहली बार अनाज और फसलों को उपजाया गया।
ज्ञान और औषधि
ऋषियों ने चंद्रमा की सहायता से प्राचीन ज्ञान और जीवनदायिनी औषधियाँ प्राप्त कीं।
ओज और शक्ति
देवताओं ने धरती की ऊर्जा से ‘ओज’ प्राप्त किया।
आध्यात्मिक शक्ति
तपस्या की आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त हुई।
सभी प्राणियों को प्राप्ति
पितरों को यमराज के मार्गदर्शन में देवी स्वधा प्राप्त हुई। यह वह ऊर्जा है जो मृत्यु के बाद भी आत्माओं को पोषण देती है।
शास्त्रों में विधान है कि जब भी पितरों के लिए कोई मंत्र पढ़ा जाए, तो अंत में “स्वधा” शब्द बोलना अनिवार्य है।
नागों ने तक्षक के मार्गदर्शन में धरती से विष प्राप्त किया।
असुरों ने इस पृथ्वी से मायारूप प्राप्त किया।
यक्षों ने कुबेर के मार्गदर्शन में अन्तर्धान होने की विद्या प्राप्त की।
गन्धर्व और अप्सराओं ने चित्ररथ के माध्यम से पृथ्वी से सुगंधों को प्राप्त किया।
इस प्रकार दूसरे लोगों ने भी अपनी-अपनी रुचि के अनुसार पृथ्वी से आयु, धन और सुख आदि प्राप्त किए।
स्वर्णिम युग
राजा पृथु के राज में:
✅ कोई भी गरीब नहीं था
✅ कोई बीमार नहीं था
✅ कोई पापी नहीं था
✅ कोई परेशानी नहीं थी
✅ सब सदा प्रसन्न रहते थे
✅ सभी धर्म में संलग्न थे
पृथु बड़े ही प्रतापी राजा थे। उनके शासन-काल में किसी को दुख या शोक नहीं था।
राजा पृथु के राज में अपना गाँव बसाने की ज़रूरत नहीं थी। सुरक्षा के लिए किले बनाने की ज़रूरत नहीं। किसी को शस्त्र धारण की ज़रूरत नहीं थी।
पृथ्वी का रूपांतरण
महाबली पृथु ने अपने धनुष की नोक से बड़े-बड़े पर्वतों को उखाड़कर हटा दिया और पृथ्वी को समतल बनाया।
राजा पृथु का यह प्रसंग यज्ञ ओर श्राद्ध सभी अवसरों पर सुनाने के योग्य है।
यह भूमि धर्मात्मा पृथु की कन्या मानी गयी;
इसीसे विद्वान् पुरुष ‘पृथ्वी’ कहकर इसकी स्तुति करते हैं।
इस प्रकार हमारी धरती को महान राजा पृथु के नाम पर ‘पृथ्वी’ कहा जाता है। एक कथा जो हमें सिखाती है कि कैसे धर्म, न्याय और सही मार्गदर्शन से पूरी सृष्टि का कल्याण होता है।
॥ ॐ शान्ति शान्ति शान्तिः ॥
