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परिचय कुबेर और हेममाली हेममाली का श्राप मार्कण्डेय जी से मिलन योगिनी एकादशी व्रत व्रत के लाभ निष्कर्षयोगिनी एकादशी व्रत कथा
आषाढ़ मास के कृष्णपक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी कहा जाता है। इस व्रत कथा में हम जानेंगे कि कैसे एक यक्ष हेममाली को श्राप से मुक्ति मिली और इस व्रत का महत्व क्या है।
कुबेर और हेममाली
अलकापुरी में राजा कुबेर रहते हैं। वे सदा भगवान शिव की भक्ति में तत्पर रहते हैं।
उनके हेममाली नाम का एक यक्ष सेवक था। जो कुबेर जी जब पुजा करते थे तो उनके लिए फूल लाया करता था।
हेममाली की पत्नी का नाम विशालाक्षी था। हेममाली अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करता था।
एक बार हेम माली मानसरोवर से फूल लाकर अपने घर में ही ठहर गया और कुबेर के भवन में न जा सका।
इधर कुबेर मंदिर में बैठकर श्री शिवजी का पूजन कर रहे थे। उन्होंने दोपहर तक फूल आने की प्रतीक्षा की।
हेममाली का श्राप
जब पूजा का समय निकल गया, तो यशराज ने क्रोध में आकर सेवकों से बोला कि पता लगाएं कि हेममाली क्यों नहीं आया?
सेवकों ने बताया कि हेम माली अपने घर में ही अपनी पत्नी के साथ समय व्यतीत कर रहा है।
इस बात से कुबेर क्रोध में आ गए और तुरंत ही हेममाली को बुलवाया। हेममाली इस बात से डर गया और कुबेर के सामने आकर खड़ा हो गया।
कुबेर क्रोध से बोले “हे पापी, तूने भगवान की अवहेलना की है। अत: तुझे कोड़ हो जाए और तू अपनी पत्नी से दूर हो जाए।”
कुबेर के ऐसा कहने पर हेम माली उस स्थान से नीचे गिर गया। इस बात का उसे बहुत दुख हुआ। उसके सारे शरीर पर कोड़ हो गया।
परंतु शिव पूजा के प्रभाव से उसकी स्मरण शक्ति अभी भी वैसी ही थी। उसे अपने पूर्व कर्म याद थे।
मार्कण्डेय जी से मिलन
वह घूमता हुआ मेरु गिरी पर्वत पर पहुंचा। वहाँ उसे महान मुनिवर मार्कण्डेय जी के दर्शन हुए। उसने दूर से ही उन्हें प्रणाम किया।
मार्कण्डेय जी ने उसे डर से कांपते देखा। उनके मन में परोपकार की भावना उमड़ पड़ी। उन्होंने उससे पूछा कि उसे कोड का रोग कैसे हो गया?
हेम माली बोला “मैं कुबेर का सेवक हूँ। मैं प्रति दिन उनकी पूजा के लिए फूल ले जाया करता था। एक दिन भूलवश मैं उनकी सेवा में समय पर फूल न ले जा सका। इस पर कुपित होकर कुबेर जी ने मुझे श्राप दे दिया।”
“हे मुनिवर इस समय किसी शुभ कर्म के प्रभाव से मैं आपके पास आ पहुंचा हूँ। अब मुझे क्या करना चाहिए इस बारे में मेरा मार्गदर्शन कीजिये।”
योगिनी एकादशी व्रत
मार्कण्डेय जी ने कहा, “तुम आषाढ़ मास के कृष्णपक्ष में योगिनी एकादशी का व्रत करो। इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारा कोढ़ निश्चित रूप से दूर हो जाएगा।”
हेम माली ने उपदेश के अनुसार योगीनी एकादशी का व्रत किया। जिससे उसके शरीर का कोढ़ ठीक हो गया। और वह वापस पूर्ण सुखी हो गया।
व्रत का समय
आषाढ़ मास के कृष्णपक्ष की एकादशी
रोग निवारण
गंभीर रोगों से मुक्ति
श्राप मुक्ति
श्राप और अभिशाप से मुक्ति
व्रत के लाभ
श्री कृष्ण बोले “जो 88,000 ब्राह्मणों को भोजन कराता है, उस के समान ही फल उस मनुष्य को भी मिलता है, जो योगिनी एकादशी का व्रत करता है।”
इस एकादशी का व्रत महान पापों को शांत करने वाला है और बहुत ही पुण्यप्रद है।
पाप निवारण
सभी पापों से मुक्ति मिलती है
पुण्य प्राप्ति
88,000 ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान पुण्य
मानसिक शांति
मन की शांति और स्थिरता प्राप्त होती है
सुरक्षा
बुरी शक्तियों से सुरक्षा मिलती है
निष्कर्ष
इस कथा के पदने और सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।
योगिनी एकादशी का व्रत करने से न केवल रोगों से मुक्ति मिलती है, बल्कि जीवन में सुख, शांति और समृद्धि भी आती है।
हेममाली की कहानी हमें सिखाती है कि कर्तव्य का पालन करना कितना महत्वपूर्ण है और साथ ही यह भी बताती है कि प्रायश्चित और सही मार्गदर्शन से हम अपने जीवन को फिर से सही दिशा में ला सकते हैं।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
