Padma Purana (पद्म पुराण)

पद्म पुराण – एक परिचय

श्रीव्यासजीके शिष्य परम बुद्धिमान् लोमहर्षणजीने अपने पुत्र उग्रश्रवा नामक सूतसे कहा—’बेटा ! तुम ऋषियोंके आश्रमोंपर जाओ और उनके पूछनेपर सम्पूर्ण धर्मोंका वर्णन करो। मैंने महर्षि वेदव्यासजीके मुखसे समस्त पुराणोंका ज्ञान प्राप्त किया है और वह सब तुम्हें बता दिया है; अतः अब मुनियोंके समक्ष तुम उसका विस्तारके साथ वर्णन करो। सभी ऋषि तुम्हें नैमिषारण्यमें में मिलेंगे। वहीं तुम भी जाओ और ऋषियोंके पूछनेपर उनके धर्म-विषयक संशयोंका निवारण करो।”

तब ज्ञानी उग्रश्रवा पिताकी आज्ञा मानकर, उन मुनीश्वरोंके पास गये, तथा हाथ जोड़कर उन्होंने प्रणाम किया। सूतजीने कहा—महर्षियो ! मेरे पिता व्यास-शिष्य लोमहर्षणजीने मुझे यह आज्ञा दी है कि, ‘तुम मुनियोंके पास जाकर उनकी सेवामें रहो और वे जो कुछ पूछें, उसे बताओ।’ आपलोग मेरे पूज्य हैं। बताइये, मैं कौन-सी कथा कहूँ ? पुराण, इतिहास अथवा भिन्न-भिन्न प्रकारके धर्म—जो आज्ञा दीजिये, वही सुनाऊँ।

तब सभी ऋषियों ने पद्म पुराण सुनने की इच्छा प्रकट की। पद्म की उत्पत्ति कैसे हुई, उससे ब्रह्माजी का आविर्भाव किस प्रकार हुआ तथा कमल से प्रकट हुए ब्रह्माजी ने किस तरह जगत्की सृष्टि की।

तब सूतजीने कहा  – अब मैं परम पवित्र पद्मपुराणका वर्णन आरम्भ करता हूँ। उसमें पाँच खण्ड और पचपन हजार श्लोक हैं। पद्मपुराणमें सबसे पहले सृष्टिखण्ड है। उसके बाद भूमिखण्ड आता है। फिर स्वर्गखण्ड और उसके पश्चात् पातालखण्ड है। तदनन्तर परम उत्तम उत्तरखण्डका वर्णन आया है। इतना ही पद्मपुराण है। भगवान की नाभिसे जो महान् पद्म (कमल) प्रकट हुआ था, जिससे इस जगत की उत्पत्ति हुई है, उसी के वृत्तान्तका आश्रय लेकर यह पुराण प्रकट हुआ है। इसलिये इसे पद्मपुराण कहते हैं। यह पुराण स्वभाव से ही निर्मल है, उस पर भी इसमें श्री विष्णु भगवान के माहात्म्यका वर्णन होने से इसकी निर्मलता और भी बढ़ गयी है। देवाधिदेव भगवान् विष्णु ने पूर्वकाल में ब्रह्माजीके प्रति जिसका उपदेश किया था, तथा ब्रह्माजी ने जिसे अपने पुत्र मरीचि को सुनाया था वही यह पद्मपुराण है। ब्रह्माजी ने ही इसे इस जगत में प्रचलित किया है।

Srishti Khand (सृष्टि खंड)