पद्म पुराण, सृष्टि खंड
ऋषि पुलस्त्य ने भीष्म को सुनाई भगवान विष्णु के वामन अवतार, दानवराज बाष्कलि, इंद्र और तीन पग भूमि के दान से जुड़ी यह पौराणिक कथा।
वामन अवतार और बाष्कलि की कथा क्या है?
जब दानवराज बाष्कलि ने देवताओं को पराजित करके स्वर्ग और त्रिभुवन पर अधिकार कर लिया, तब इंद्र ने ब्रह्माजी की शरण ली। भगवान विष्णु ने देवताओं की सहायता के लिए वामन रूप धारण किया। इंद्र ने बाष्कलि की उदारता, वीरता और दानशीलता की प्रशंसा करते हुए वामन के लिए तीन पग भूमि माँगी। बाष्कलि ने अपना वचन निभाया। इसके बाद भगवान वामन ने त्रिविक्रम रूप धारण करके तीन पगों में समस्त लोकों को नाप लिया। भगवान के चरण से गंगाजी का प्रादुर्भाव हुआ और बाष्कलि ने भगवान से भक्ति का वरदान माँगा।
कथा का स्रोत और कथावाचक
यह कथा पद्म पुराण के सृष्टि खंड में वर्णित है। ऋषि पुलस्त्य ने यह कथा भीष्म को सुनाई थी।
इंद्र की ब्रह्मा से प्रार्थना
स्वर्गलोक और अपना राज्य खोकर इंद्र अत्यंत दुखी हुए। उन्हें ज्ञात था कि ब्रह्माजी के वरदान के कारण बाष्कलि को युद्ध में पराजित करना कठिन है। इसलिए इंद्र सभी देवताओं को साथ लेकर ब्रह्मलोक पहुँचे।
इंद्र ने ब्रह्माजी से कहा, “दानवों ने हमारा राज्य छीन लिया है। यज्ञ, वेदाध्ययन और धर्माचरण कमजोर पड़ गए हैं। संसार में अशांति फैल रही है। देवताओं की रक्षा के लिए कोई उपाय कीजिए।”
ब्रह्माजी ने इंद्र को धैर्य दिया और कहा कि भगवान श्रीविष्णु ही बाष्कलि के प्रभाव का अंत कर सकते हैं। इसके बाद ब्रह्माजी भगवान विष्णु का ध्यान करने लगे।
ब्रह्माजी के ध्यान करते ही भगवान विष्णु उनके सामने प्रकट हुए। ब्रह्माजी ने देवताओं की कठिनाई बताकर भगवान से त्रिभुवन की रक्षा करने की प्रार्थना की।
भगवान विष्णु की योजना
भगवान विष्णु ने कहा कि बाष्कलि को सीधे युद्ध में पराजित करना उचित नहीं होगा, क्योंकि वह ब्रह्माजी के वरदान से सुरक्षित है। उसे उसके अपने धर्म, दानशीलता और वचनबद्धता के माध्यम से परास्त किया जाएगा।
भगवान ने बताया कि वे वामन, अर्थात छोटे ब्राह्मण बालक का रूप धारण करेंगे। इंद्र उनके साथ बाष्कलि के पास जाएँगे और वामन के लिए केवल तीन पग भूमि माँगेंगे। बाष्कलि की दानशीलता ऐसी थी कि वह इस छोटी-सी याचना को अस्वीकार नहीं करेगा।
भगवान विष्णु का वामन अवतार
देवताओं के कल्याण और संसार की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने देवी अदिति के पुत्र रूप में जन्म लेने का निश्चय किया। उनके दिव्य अवतरण से पहले ही प्रकृति में शुभ संकेत दिखाई देने लगे। दिशाएँ निर्मल हो गईं, वायु सुगंधित हो गई और समस्त प्राणियों के मन में आनंद भर गया।
समय आने पर भगवान विष्णु वामन रूप में प्रकट हुए। उनके जन्म से महर्षि कश्यप और देवी अदिति को अत्यंत आनंद हुआ। देवताओं ने उनका स्वागत किया और तीनों लोकों में उत्सव मनाया गया।
वामन भगवान तेजस्वी ब्राह्मण बालक के रूप में बाष्कलि के पास जाने के लिए तैयार हुए। उनके छोटे शरीर में ऐसी दिव्यता थी जिसे साधारण दृष्टि पहचान नहीं सकती थी।
बाष्कलि का राज्य और चरित्र
बाष्कलि की राजधानी ऊँचे महलों, सुंदर मार्गों, विद्या, कला और वैभव से संपन्न थी। वे अपनी नगरी से ही तीनों लोकों का शासन चलाते थे। उनकी प्रजा सुरक्षित और समृद्ध थी।
बाष्कलि धर्म के ज्ञाता, सत्यवादी, कृतज्ञ, संयमी और न्यायप्रिय थे। वे ब्राह्मणों का आदर करते, शरण में आए लोगों की रक्षा करते और निर्धनों तथा अनाथों की सहायता करते थे। वे यज्ञ और तपस्या में विश्वास रखते थे तथा विद्वानों और पूजनीय व्यक्तियों का सम्मान करते थे।
उनका दान केवल संपत्ति देने तक सीमित नहीं था। वे अपने वचन, प्रतिष्ठा और धर्म की रक्षा के लिए भी त्याग करने को तैयार रहते थे। यही गुण आगे चलकर भगवान वामन की योजना का आधार बने।
इंद्र, वामन और बाष्कलि का मिलन
जब दानवों ने इंद्र को वामन ब्राह्मण के साथ अपनी नगरी में आते देखा, तब उन्होंने बाष्कलि को इसकी सूचना दी। बाष्कलि ने कहा कि इंद्र अतिथि हैं और उनका आदरपूर्वक स्वागत किया जाना चाहिए।
बाष्कलि स्वयं नगर के द्वार तक गए। उन्होंने इंद्र और वामन को सम्मानपूर्वक प्रणाम किया तथा उन्हें राजभवन में ले जाकर विधिपूर्वक उनका सत्कार किया।
इंद्र ने बाष्कलि की उदारता, वीरता और दानशीलता की प्रशंसा करते हुए वामन के लिए तीन पग भूमि माँगी। उन्होंने बताया कि वामन कश्यप ऋषि के कुल में उत्पन्न ब्राह्मण हैं और उन्हें केवल तीन पग भूमि की आवश्यकता है।
बाष्कलि ने कहा कि तीन पग भूमि माँगना बहुत छोटी याचना है। वे इंद्र को स्वर्गलोक सहित अपना समस्त राज्य देने के लिए भी तैयार हैं। उन्होंने वामन की इच्छा पूरी करने का वचन दिया।
शुक्राचार्य की चेतावनी
बाष्कलि के पुरोहित शुक्राचार्य ने वामन के वास्तविक स्वरूप को पहचान लिया। उन्होंने बाष्कलि से कहा कि वामन कोई साधारण ब्राह्मण बालक नहीं, बल्कि स्वयं भगवान विष्णु हैं। वे देवताओं का कल्याण करने के लिए बाष्कलि के पास आए हैं।
शुक्राचार्य ने बाष्कलि को चेतावनी दी कि तीन पग भूमि का दान देने से उनका राज्य और वैभव समाप्त हो सकता है। उन्होंने बाष्कलि से अपना वचन वापस लेने का आग्रह किया।
बाष्कलि ने गुरु की बात सुनी, लेकिन दान का वचन पूरा करने से इनकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि सत्पुरुष के लिए अपने वचन से पीछे हटना उचित नहीं है। यदि वामन वास्तव में भगवान विष्णु हैं, तो उन्हें दान देना उनके लिए परम सौभाग्य की बात होगी।
तीन पग भूमि का दान
बाष्कलि ने हाथ में जल लेकर भगवान वामन को तीन पग भूमि देने का संकल्प किया। उन्होंने प्रार्थना की कि भगवान श्रीहरि उनसे प्रसन्न हों। जल अर्पित होते ही दान पूर्ण हो गया।
दान का संकल्प पूरा होते ही भगवान वामन का शरीर बढ़ने लगा। उनका छोटा-सा रूप विराट हो गया और वे आकाश, दिशाओं तथा समस्त लोकों से भी विशाल दिखाई देने लगे।
त्रिविक्रम रूप और गंगाजी का प्रादुर्भाव
भगवान विष्णु ने वामन रूप त्यागकर त्रिविक्रम का विराट रूप धारण किया। उन्होंने अपने पहले पग से सूर्यलोक और दूसरे पग से ध्रुवलोक को नाप लिया। उनका विराट स्वरूप समस्त दिशाओं और लोकों में फैल गया।
जब भगवान ने तीसरे पग के लिए स्थान खोजा, तब समस्त ब्रह्मांड भी उनके दो चरणों में समा चुका था। उनके चरण के अग्रभाग से ब्रह्मांड का आवरण विदीर्ण हुआ और दिव्य जलधारा प्रकट हुई। यही पवित्र धारा आगे चलकर गंगाजी के रूप में प्रसिद्ध हुई।
| क्रम | भगवान के चरण | कथा का भाव |
|---|---|---|
| पहला पग | सूर्यलोक तक | भगवान ने लोक-विजय का आरंभ किया। |
| दूसरा पग | ध्रुवलोक तक | ऊर्ध्व लोक भी भगवान के विराट स्वरूप में समा गए। |
| तीसरा पग | ब्रह्मांड की सीमा तक | भगवान ने बाष्कलि से तीसरे पग के लिए स्थान पूछा। |
भगवान ने बाष्कलि से कहा कि अब तीसरा पग पूरा करने के लिए स्थान बताओ। बाष्कलि ने स्वीकार किया कि उसने पृथ्वी का कोई भाग छिपाकर नहीं रखा है और भगवान का विराट स्वरूप उसकी कल्पना से भी परे है।
बाष्कलि ने भगवान विष्णु से कौन-सा वरदान माँगा?
बाष्कलि की सत्यनिष्ठा और दानशीलता से भगवान विष्णु प्रसन्न हुए। उन्होंने बाष्कलि को वरदान माँगने का अवसर दिया।
बाष्कलि ने धन, राज्य या दीर्घ जीवन नहीं माँगा। उन्होंने भगवान विष्णु की भक्ति माँगी और यह इच्छा प्रकट की कि उनकी मृत्यु भी भगवान के हाथों हो, जिससे उन्हें भगवान के परम धाम की प्राप्ति हो।
भगवान विष्णु ने कहा कि एक कल्प के बाद जब वे वराह रूप धारण करके रसातल में प्रवेश करेंगे, तब बाष्कलि का वध उनके हाथों होगा और बाष्कलि भगवान के स्वरूप में लीन हो जाएँगे।
इसके बाद बाष्कलि पाताललोक में रहने लगे और इंद्र ने फिर से तीनों लोकों का पालन संभाल लिया।
कथा से मिलने वाली आध्यात्मिक शिक्षा
- वचन-पालन: धर्मपरायण व्यक्ति कठिन परिस्थिति में भी अपने वचन की मर्यादा रखता है।
- दान: सच्चा दान केवल संपत्ति का त्याग नहीं, बल्कि लोकहित और समर्पण की भावना है।
- विनय: शक्ति, वैभव और अधिकार होने पर भी नम्र बने रहना महानता का लक्षण है।
- भक्ति: बाष्कलि ने सांसारिक संपत्ति के स्थान पर भगवान की भक्ति का वरदान माँगा।
- राजधर्म: आदर्श शासक अपनी शक्ति का उपयोग प्रजा की रक्षा और कल्याण के लिए करता है।
- ईश्वर-समर्पण: भगवान के सामने अहंकार का त्याग करके समर्पण करना आत्मिक उन्नति का मार्ग है।
क्या बाष्कलि और राजा बलि एक ही व्यक्ति हैं?
नहीं। बाष्कलि और राजा बलि दो अलग-अलग दानवराज थे। भगवान विष्णु ने अलग-अलग कल्पों और मन्वन्तरों के कालखंडों में वामन रूप धारण करके दोनों से संबंधित लीलाएँ कीं।
दानवराज बाष्कलि की कथा पूर्वकालीन मन्वन्तर की है। उस समय भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण करके बाष्कलि से तीन पग भूमि का दान लिया, त्रिविक्रम रूप धारण किया और तीनों लोकों को नाप लिया। बाष्कलि ने भगवान से भक्ति का वरदान माँगा और बाद में पाताललोक में रहने लगे।
राजा बलि की कथा वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तर की है। इस प्रसंग में भी भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण किया और राजा बलि से तीन पग भूमि माँगी। इसके बाद भगवान ने त्रिविक्रम रूप धारण करके राजा बलि को पाताललोक भेजा।
इसलिए बाष्कलि और राजा बलि को एक ही व्यक्ति नहीं माना जाना चाहिए। दोनों वामन-त्रिविक्रम प्रसंग अलग-अलग मन्वन्तरों में घटित हुए हैं।
इसके बाद ऋषि पुलस्त्य ने भीष्म को राजा बलि से संबंधित एक अलग वामन-त्रिविक्रम प्रसंग सुनाया। इसलिए बाष्कलि और राजा बलि की कथाओं को अलग-अलग प्रसंगों के रूप में समझना चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
बाष्कलि कौन थे?
बाष्कलि एक शक्तिशाली दानवराज थे। वे पराक्रमी होने के साथ दानी, सत्यवादी, धर्मपरायण, संयमी और प्रजा-हितैषी भी थे।
इंद्र बाष्कलि के पास क्यों गए?
दानवों ने देवताओं को पराजित करके उनका राज्य छीन लिया था। भगवान विष्णु की योजना के अनुसार इंद्र वामन भगवान के साथ बाष्कलि के पास तीन पग भूमि माँगने गए।
भगवान वामन ने बाष्कलि से क्या माँगा?
भगवान वामन ने बाष्कलि से तीन पग भूमि माँगी। बाष्कलि ने जल अर्पित करके दान का संकल्प पूरा किया।
बाष्कलि ने भगवान विष्णु से कौन-सा वरदान माँगा?
बाष्कलि ने भगवान विष्णु की भक्ति माँगी और इच्छा की कि उनकी मृत्यु भगवान के हाथों हो, जिससे उन्हें भगवान के परम धाम की प्राप्ति हो।
क्या बाष्कलि और राजा बलि एक ही व्यक्ति थे?
नहीं। बाष्कलि और राजा बलि दो अलग-अलग दानवराज थे। बाष्कलि की कथा पूर्वकालीन मन्वन्तर की है, जबकि राजा बलि की कथा वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तर की है। भगवान विष्णु ने अलग-अलग कालखंडों में वामन रूप धारण करके दोनों से संबंधित लीलाएँ कीं।
यह कथा किस ग्रंथ में वर्णित है?
यह कथा पद्म पुराण के सृष्टि खंड में वर्णित है। ऋषि पुलस्त्य ने यह कथा भीष्म को सुनाई थी।
इस कथा की मुख्य शिक्षा क्या है?
इस कथा की मुख्य शिक्षा है कि सत्य, दान, विनय, वचन-पालन, भक्ति और लोककल्याणपूर्ण आचरण मनुष्य को महान बनाते हैं।
