Sukh Amavasya Vrat Katha | Kalyug mein bhi Sukh dene wali Sukh Amavasya ki Adbhut Kahani

व्रत कथा

सुख अमावस्या की पहली कथा

रानी, राजा और सुख अमावस्‌ के व्रत की महिमा से जुड़ी कथा

संक्षिप्त सारांश

सुख अमावस्या की पहली कथा का सार

सुख अमावस्‌ की पहली कथा में एक धार्मिक रानी सुख अमावस्‌ का व्रत करती है। कथा में इस व्रत की कृपा से उसके बच्चे और राजा सुरक्षित रहते हैं। बाद में राजा व्रत की महिमा मानकर प्रजा को भी हर अमावस्‌ को सुख अमावस्‌ का व्रत करने को कहते हैं। कथा के अनुसार यह व्रत शुक्रवार को पड़ने वाली अमावस्‌ से शुरू करके इक्कीस अमावस तक किया जाता है और उद्यापन में श्रद्धानुसार भोजन व दान किया जाता है।

सुख अमावस्या की कथा

सुख, विश्वास और व्रत की महिमा

नीचे दी गई कथा में मूल प्रसंग और व्रत-विधि को क्रम से प्रस्तुत किया गया है।

01

राजा, रानी और साहूकार की हवेली

एक नगरी में एक राजा व उसकी प्रजा सभी आनन्द से रहते थे। राजा की रानी धार्मिक विचारों की थी। राजा के महल के सामने एक साहूकार की हवेली थी। रानी एवं सेठानी में मित्रता थी।

एक रोज साहूकार की हवेली से रोने की आवाज आने लगी। रानी ने राजा से इस विलाप का कारण पूछा। राजा ने कहा कि सेठ का पुत्र मर गया है, इसलिये सभी दुःखी हो विलाप कर रहे है।

02

रानी का प्रश्न और ज्योतिषी की बात

रानी ने कहा ये इतने दुःखी होकर क्यों रो रहे है। दुःख क्या होता है ? रानी ने ज्योतिषी को बुलाया और कहा- मुझे रोना नहीं आता। दुःख क्या होता है ?

ज्योतिषी ने कहा, तुम ऐसा व्रत तो नहीं करती जिससे दुःख पास ही नहीं आता हो। रानी ने कहा “मैं सुख अमावस्‌ का व्रत करती हूँ।”

ज्योतिषी ने कहा आप व्रत करना छोड़ दो, दुःख अपने आप आ जायेगा। रानी ने कहा, व्रत तो मैं नहीं छोड़ सकती, कोई और बात बताओ।

ज्योतिषी ने कहा, आप लड्डू में जहर डालकर अपने बच्चे को खिलाना।

रानी ने ऐसा ही किया। बच्चे लड्डू खा कर सो गए। सुख अमावस्‌ माँ ने उनका जहर दूर कर दिया।

03

कुँवर पर आई दूसरी परीक्षा

बच्चे सो कर वापस उठ गये। रानी ने थोड़े दिन बाद ज्योतिषी को वापस बुलाया। और पूछा तो ज्योतिषी बोले, इस बार कुंवर को महल से नीचे डाल दो। फिर मालूम हो जायेगा कि दुःख क्या होता है।

महारानी ने अपने कुंवर को गोद में उठाया और महल के ऊपर ले गई, और ऊपर से कुंवर को नीचे गिरा दिया। सुख अमावस्‌ मां ने कुँवर को ऊपर ही गोद में ले लिया और उसे नीचे आंगन में बैठा दिया।

कुँवर को खरोंच ही नहीं आई। रानी ने नीचे आकर देखा बच्चा खेल रहा है। रानी को अति सुख हुआ अतः उसे रोना नहीं आया।

04

राजा का युद्ध के लिए प्रस्थान

अब रानी ने राजा से पूछा महाराज दुःख क्या होता है ? उस समय पड़ोसी राज्य से युद्ध चल रहा था। राजा ने रानी से कहा कि, मैं अकेला युद्ध में जा रहा हूँ। मेरे मरने के बाद तुम्हें समझ आ जायेगा कि दुःख क्या होता है ?

राजा ने युद्ध के लिये प्रस्थान किया। लेकिन भगवान और मां अमावस्‌ की कृपा से राजा विजयी होकर घर आ गया।

अब राजा को भी आश्चर्य होने लगा। रानी ने फिर पूछा, महाराज दुःख क्या है ?

05

गंगाजी की यात्रा और शिव-पार्वती का संवाद

राजा ने सोचा रानी को कैसे समझाया जाये ? राजा ने रानी को बुलवाया और कहा कि मैं गंगाजी में कूद जाऊंगा तब तक तुम्हें दुःख का एहसास होगा। राजा ने यात्रा के लिये प्रस्थान किया।

उधर शिवजी पार्वती से बोले, सती मैं अब तुम्हें सुखी आत्मा रानी के दर्शन कराऊंगा, वे वेष बदलकर पृथ्वी लोक पर आये। और रानी को देखा कि वो सुख अमावस्‌ का पूजन कर रही है।

पार्वती ने पूछा कि कलियुग में भी रानी को दुख क्यों नहीं है।

शिवजी बोले, रानी पूर्व जन्म में ब्राह्मणी थी और सुख अमावस्‌ का व्रत किया करती थी। सो इस जन्म में सुख का आनन्द ले रही है। सती, राजा गया तो है पर गंगाजी में भी नहीं मरेगा।

तभी राजा गंगा स्नान कर वापस आया।

06

व्रत की महिमा

राजा ने रानी के व्रत की महिमा मानी। और नगरी में ढिंढोरा पिटवाया कि सभी प्रजाजन हर अमावस्‌ को सुख अमावस्‌ का व्रत करें और स्वयं भी करने लगा।

यह व्रत जिस दिन शुक्रवार को अमावस्‌ हो, उसी दिन शुरू करें। इसको सुख अमावस्‌ का व्रत कहते है। इक्कीस अमावस तक व्रत करें।
व्रत-विधि

इक्कीस अमावस तक व्रत और दान

पहले पाँच अमावस्‌ को गेहूं खाना और तांबे का पात्र, गेहूं, लाल वस्त्र, दक्षिणा दान देना। इसके बाद व्रत के क्रम में चना या चना दाल, मूंग और चावल का सेवन तथा संबंधित दान किया जाता है।

पहले पाँच अमावस्‌

गेहूं खाना और तांबे का पात्र, गेहूं, लाल वस्त्र, दक्षिणा दान देना।

फिर पाँच अमावस्‌

चना या चना दाल खाना और चना दाल, पीले वस्त्र, सोने का खेरा व दक्षिणा दान देना।

फिर पाँच अमावस्‌

मूंग खाना और गाय को हरा चारा व मूंग व दक्षिणा का दान करना।

बाकी अमावस

चावल खाये व चावल, सफेद वस्त्र, चांदी व दक्षिणा का दान करे, ब्राह्मण को भोजन कराये।

उद्यापन: व्रत पूरा होने पर कम से कम 5, 7, 11,21 स्त्रियों को अपनी श्रद्धानुसार भोजन करावे और दान करे। इस प्रकार उद्यापन करने से कभी दुःख न होगा व घर में सुख समृद्धि का भण्डार हमेशा भरपूर रहेगा।
प्रश्न और उत्तर

सुख अमावस्या की पहली कथा से जुड़े सामान्य प्रश्न

कथा और व्रत-विधि पर आधारित पाँच सीधे प्रश्न और उत्तर।

1. सुख अमावस्या की पहली कथा में रानी कैसी थी?

उत्तर: सुख अमावस्या की पहली कथा में राजा की रानी धार्मिक विचारों वाली थी और सुख अमावस्‌ का व्रत करती थी।

2. रानी ने ज्योतिषी से क्या पूछा था?

उत्तर: रानी ने ज्योतिषी से पूछा था, “दुःख क्या होता है?” रानी ने कहा था कि उसे रोना नहीं आता।

3. सुख अमावस्या का व्रत कब शुरू करना चाहिए?

उत्तर: जिस दिन शुक्रवार को अमावस्‌ हो, उसी दिन सुख अमावस्‌ का व्रत शुरू करना चाहिए।

4. सुख अमावस्या का व्रत कितनी अमावस तक करना चाहिए?

उत्तर: सुख अमावस्‌ का व्रत इक्कीस अमावस तक करने को कहा गया है।

5. सुख अमावस्या के उद्यापन में कितनी स्त्रियों को भोजन कराना चाहिए?

उत्तर: व्रत पूरा होने पर कम से कम 5, 7, 11 या 21 स्त्रियों को श्रद्धानुसार भोजन कराने और दान करने को कहा गया है।

सुख अमावस्या की पहली कथा

Vrat Katha Sangrah

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